उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर उफान पर है। धीरेंद्र शास्त्री और स्वामी प्रसाद मौर्य के बीच छिड़ी जुबानी जंग ने माहौल को और भी गर्मा दिया है। बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेन्द्र शास्त्री के बयानों पर पहले भी विवाद होते रहे हैं, लेकिन इस बार निशाना सीधा और तीखा है। स्वामी प्रसाद मौर्य ने आरोप लगाया है कि “हिंदू राष्ट्र” के नाम पर जनता की भावनाओं को भड़काया जा रहा है और इसका मकसद सिर्फ राजनीतिक जमीन तैयार करना है। मौर्य के इस बयान के बाद प्रदेशभर में चर्चा तेज हो गई है। राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उछल रहा है कि आखिर यह हमला किस संदर्भ में किया गया और इसके पीछे की बड़ी तस्वीर क्या है?
“नफरत फैलाने वाले जेल में होने चाहिए”मौर्य की कड़ी प्रतिक्रिया
स्वामी प्रसाद मौर्य ने अपने बयान में किसी भी तरह की नरमी नहीं दिखाई। उन्होंने कहा कि जो लोग धर्म के नाम पर समाज में जहर घोलने की कोशिश करते हैं, वे राष्ट्र हित के नहीं बल्कि खुद के हित के लिए काम करते हैं। मौर्य ने यह भी दावा किया कि “हिंदू राष्ट्र” का नारा देकर कुछ लोग भोली-भाली जनता की भावनाओं से खेल रहे हैं। उनका कहना है कि ऐसे तत्वों को समाज में जगह नहीं, बल्कि जेल में होना चाहिए। मौर्य ने यह आरोप भी लगाया कि नफरत की राजनीति यूपी की असली समस्याओं—जैसे बेरोजगारी, महंगाई, सुरक्षा—से ध्यान भटकाने का तरीका बन गई है।
शास्त्री के समर्थक सक्रिय, बयानबाजी का दौर तेज़
धीरेन्द्र शास्त्री के समर्थन में कई लोग खुलकर सामने आए हैं और सोशल मीडिया पर यह बहस और ज्यादा तूल पकड़ती जा रही है। शास्त्री के भक्तों का कहना है कि शास्त्री सिर्फ आध्यात्मिक संदेश देते हैं और समाज को जोड़ने का काम करते हैं। लेकिन मौर्य के आरोपों ने उनके समर्थकों को भी चौंका दिया है। दोनों पक्षों में बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला लगातार जारी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी मौसम नजदीक आते ही इस तरह के विवाद और बढ़ सकते हैं, क्योंकि धर्म और राजनीति का मिश्रण हमेशा से सियासत में “तेज हथियार” माना गया है।
चुनावी रणनीति या वैचारिक लड़ाई? बढ़ रही है पूछताछ
राजनीतिक जानकार इस पूरे विवाद को सिर्फ बयानबाजी नहीं, बल्कि एक बड़ी रणनीतिक टकराहट के रूप में देख रहे हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य लंबे समय से बीजेपी और उसके समर्थित समूहों पर हमला बोलते आए हैं, जबकि धीरेन्द्र शास्त्री के प्रवचन बीजेपी समर्थक वर्ग में लोकप्रिय हैं। ऐसे में मौर्य का यह बयान आगामी राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ व्यक्तिगत नाराज़गी है या फिर एक गहरी वैचारिक लड़ाई का हिस्सा? यूपी की राजनीति में जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे, यह विवाद और बड़ा रूप ले सकता है और इसके असर कई राजनीतिक दलों की रणनीति पर भी दिख सकते हैं।
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