उत्तर प्रदेश में बिजली के निजीकरण को लेकर चल रहा विरोध अब देशव्यापी आंदोलन में बदलने जा रहा है। बिजली कर्मचारियों के साथ-साथ किसान और मजदूर संगठन भी अब खुलकर मैदान में उतरने की तैयारी कर चुके हैं। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने बताया कि अगर केंद्र सरकार संसद के आने वाले बजट सत्र में इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) बिल 2025 को पेश करने या पास कराने की कोशिश करती है, तो इसका जोरदार विरोध किया जाएगा। इस आंदोलन में पूरे देश से 25 करोड़ से ज्यादा किसान, मजदूर, बिजली कर्मचारी और इंजीनियर शामिल होंगे। संगठनों का कहना है कि बिजली सिर्फ एक सेवा नहीं, बल्कि आम लोगों की जरूरत है और इसका निजीकरण जनता के हितों के खिलाफ है। उनका मानना है कि निजी कंपनियों के आने से बिजली महंगी होगी और गरीब व मध्यम वर्ग पर सीधा असर पड़ेगा। इसलिए इस मुद्दे को अब सिर्फ कर्मचारियों की लड़ाई नहीं, बल्कि जनहित का सवाल बताया जा रहा है।
ट्रेड यूनियन और किसान संगठनों का एकजुट फैसला
इस बड़े आंदोलन का फैसला दस केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और संयुक्त किसान मोर्चा की एक संयुक्त बैठक में लिया गया। यह बैठक ऑनलाइन हुई, जिसमें देश के बड़े मजदूर और किसान नेताओं ने हिस्सा लिया। बैठक में तय किया गया कि बिजली के निजीकरण और इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) बिल 2025 को अगर बिना चर्चा के संसद से पास कराने की कोशिश की गई, तो तुरंत देशभर में विरोध शुरू कर दिया जाएगा। इसे “लाइटनिंग एक्शन” नाम दिया गया है, यानी बिना देर किए सड़कों पर उतरकर आंदोलन करना। इस बैठक में एटक की जनरल सेक्रेटरी अमरजीत कौर, इंटक के अशोक सिंह, सीटू के तपन सेन, संयुक्त किसान मोर्चा के नेता डॉ. दर्शन पाल सहित कई बड़े संगठनों के पदाधिकारी शामिल रहे। सभी ने एक सुर में कहा कि बिजली जैसे जरूरी क्षेत्र को निजी हाथों में सौंपना देश और जनता दोनों के लिए नुकसानदेह है। नेताओं का कहना है कि इससे रोजगार घटेंगे और आम उपभोक्ताओं की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।
यूपी में 427 दिनों से जारी संघर्ष, जेल भरो आंदोलन की चेतावनी
उत्तर प्रदेश इस पूरे आंदोलन का केंद्र बना हुआ है। ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन और विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति के संयोजक शैलेन्द्र दुबे ने बताया कि यूपी के बिजली कर्मचारी पिछले 427 दिनों से लगातार निजीकरण के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण की तैयारी से कर्मचारियों में भारी नाराजगी है। संघर्ष समिति ने साफ कहा है कि जैसे ही इन दोनों बिजली कंपनियों के निजीकरण के लिए टेंडर जारी होंगे, वैसे ही पूरे प्रदेश में सामूहिक जेल भरो आंदोलन शुरू कर दिया जाएगा। बिजली कर्मियों का कहना है कि वे किसी भी हालत में सरकारी बिजली व्यवस्था को निजी कंपनियों को सौंपने नहीं देंगे। उनका तर्क है कि सुधार जरूरी हैं, लेकिन निजीकरण समाधान नहीं है। कर्मचारियों को डर है कि निजीकरण के बाद नौकरियां असुरक्षित हो जाएंगी और ठेका प्रथा और बढ़ेगी।
किसान और मजदूर क्यों कर रहे हैं समर्थन, आम जनता पर क्या असर
इस आंदोलन को किसान और मजदूर संगठनों का पूरा समर्थन मिल रहा है। किसान संगठनों का कहना है कि बिजली के निजीकरण से खेती की लागत बढ़ जाएगी। सिंचाई के लिए बिजली महंगी होगी, जिससे छोटे और मध्यम किसानों पर सीधा असर पड़ेगा। वहीं मजदूर संगठनों का कहना है कि निजी कंपनियां मुनाफे को प्राथमिकता देती हैं, न कि रोजगार और सामाजिक जिम्मेदारी को। इससे स्थायी नौकरियां खत्म हो सकती हैं और मजदूरों का शोषण बढ़ सकता है। संगठनों ने कहा कि अगर सरकार ने समय रहते इस बिल को वापस नहीं लिया, तो यह आंदोलन गांव-गांव और शहर-शहर तक फैलाया जाएगा। रैलियां, धरना-प्रदर्शन और जनसभाएं आयोजित की जाएंगी, ताकि आम लोग इस मुद्दे को समझ सकें। नेताओं का दावा है कि आने वाले समय में यह आंदोलन देश का सबसे बड़ा जन आंदोलन बन सकता है, जिसमें सरकार पर फैसला बदलने का भारी दबाव बनेगा।
