अयोध्या के भव्य राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का मामला इस समय देश की सबसे बड़ी सुर्खियों में से एक बना हुआ है। हाल ही में इस पूरे विवाद के बाद चंपत राय और अनिल मिश्रा का इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया, जिसने हर किसी को हैरान कर दिया। लेकिन अब इस मामले में श्रीरामजन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी महाराज ने एक ऐसा सनसनीखेज बयान दिया है, जिसने राजनीतिक और धार्मिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। गोविंद देव गिरी ने दावा किया है कि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को उठाने से बहुत पहले ही तत्कालीन महासचिव चंपत राय को चढ़ावा चोरी की भनक लग चुकी थी। हालांकि, बातचीत के दौरान उन्होंने सीधे तौर पर सपा प्रमुख का नाम लेने से परहेज किया, लेकिन उनका इशारा साफ था कि इस पूरे घोटाले की जानकारी ट्रस्ट के भीतर पहले से ही मौजूद थी।
चंपत राय का बचाव या ‘अहंकार’ पर चोट? कोषाध्यक्ष ने खोले कई राज
इस बातचीत के दौरान गोविंद देव गिरी महाराज का रुख काफी मिला-जुला नजर आया। एक तरफ जहां उन्होंने चंपत राय का बचाव किया, वहीं दूसरी तरफ उनकी कमियों को भी उजागर करने से पीछे नहीं हटे। उन्होंने चंपत राय को ‘श्रेष्ठ और निष्कलंक’ बताते हुए कहा कि उनका इरादा किसी भी दोषी या गलत इंसान को बचाने का बिल्कुल नहीं था। कोषाध्यक्ष के मुताबिक, चंपत राय की सबसे बड़ी गलती यह रही कि उन्होंने गलत लोगों पर जरूरत से ज्यादा भरोसा कर लिया, और उन्हीं करीबियों व सहयोगियों ने उनके साथ बड़ा विश्वासघात कर दिया। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई; गोविंद देव गिरी ने चंपत राय के स्वभाव पर भी बेबाकी से टिप्पणी की। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि चंपत राय का ‘मैं’ यानी उनका अहंकार भी इस पूरी परिस्थिति और लापरवाही के लिए कहीं न कहीं जिम्मेदार रहा है।
‘मैं इस्तीफा क्यों दूं?’ सवाल सुनते ही भड़के गोविंद देव गिरी, सुरक्षाकर्मियों ने रोका इंटरव्यू
जैसे ही इंटरव्यू में बात जिम्मेदारी और जवाबदेही पर आई, माहौल अचानक बेहद तनावपूर्ण हो गया। जब गोविंद देव गिरी महाराज से यह तीखा सवाल पूछा गया कि ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष होने के नाते क्या इस पूरे चोरी कांड में उनकी खुद की भी कोई नैतिक जिम्मेदारी बनती है? और क्या वह अपने पद से इस्तीफा देंगे? तो इस पर वह बुरी तरह भड़क गए। उन्होंने बेहद तल्ख लहजे में पलटवार करते हुए कहा, “मैं इस्तीफा क्यों दूं?” माहौल को बिगड़ता देख उनके सुरक्षाकर्मी तुरंत हरकत में आ गए और उन्होंने बीच में ही साक्षात्कार को रुकवाने की पुरजोर कोशिश की। कैमरे और बातचीत को रोकने के इस ड्रामे के बीच कोषाध्यक्ष ने अपनी स्थिति साफ करने का प्रयास किया।
हुंडियों की गिनती से पल्ला झाड़ा: बोले- मेरी कोई भूमिका नहीं थी
विवाद बढ़ता देख गोविंद देव गिरी ने खुद को इस पूरे वित्तीय प्रबंधन और गड़बड़ी से पूरी तरह अलग कर लिया। उन्होंने गुस्से को थोड़ा शांत करते हुए स्पष्ट किया कि राम मंदिर परिसर में दानपात्रों (हुंडियों) से निकलने वाले चढ़ावे और उसकी गिनती की प्रक्रिया में उनका कोई सीधा हस्तक्षेप नहीं था। उन्होंने कहा कि हुंडियों की गिनती और उसकी निगरानी की व्यवस्था में न तो कल मेरी कोई भूमिका थी और न ही आज मेरी कोई भूमिका है। इस बयान के बाद अब यह सवाल और गहरा गया है कि अगर कोषाध्यक्ष की भी इसमें कोई भूमिका नहीं थी, तो आखिर इतनी बड़ी सुरक्षा और निगरानी प्रणाली के बीच रामलला के दरबार में चढ़ावे की चोरी को इतने लंबे समय तक अंजाम कौन दे रहा था और इसके लिए असली जिम्मेदार कौन है।
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