उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के सरधना थाना क्षेत्र के कपसाढ़ गांव में गुरुवार को दलित महिला सुनीता की हत्या और बेटी के अपहरण की घटना के बाद माहौल पूरी तरह तनावपूर्ण हो गया था। गांव से करीब 30 किलो मीटर पहले से ही सड़कों पर हर 10 किलोमीटर पर पुलिस और RAF की तैनाती कर दी गई थी। गांव के भीतर भी हालात किसी छावनी जैसे थे। तंग गलियों, ओवरफ्लो नालियों और कीचड़ से भरे रास्तों के बीच सुनीता का छोटा सा घर था, जिसके ऊपर बाबा साहेब अंबेडकर की तस्वीर लगी हुई थी। घर के बाहर अलाव जल रहा था और आसपास सन्नाटा पसरा था। मौके पर यूपी सरकार के मंत्री सुनील बराला और सरधना के पूर्व विधायक संगीत सोम मौजूद थे, जो मृतका के बेटे नरसी को यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे थे कि आरोपी जल्द गिरफ्तार होगा। दूसरी तरफ, आज़ाद समाज पार्टी के कार्यकर्ता भी गांव के बाहर जुटने लगे थे, जिन्हें पुलिस लगातार रोक रही थी। दलित समुदाय में इस बात को लेकर नाराज़गी थी कि एक जनप्रतिनिधि को भी पीड़ित परिवार से मिलने नहीं दिया जा रहा।
दिल्ली एयरपोर्ट से शुरू हुआ पीछा और पुलिस की रणनीति
इसी बीच, नगीना से सांसद चंद्रशेखर आज़ाद दिल्ली पहुंचे। दोपहर करीब एक बजे उनका विमान इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर उतरा। जैसे ही वे बाहर निकले, सादी वर्दी में मौजूद पुलिसकर्मी उनके पीछे लग गए। सांसद को तुरंत यह आभास हो गया कि उन पर नजर रखी जा रही है। उन्होंने सामान्य तरीके से अपने दिल्ली स्थित आवास की ओर रुख किया, लेकिन पुलिस की गाड़ियां लगातार उनके साथ चलती रहीं। करीब ढाई बजे जब चंद्रशेखर आज़ाद अपने बंगले से मेरठ के लिए निकले, तब यूपी पुलिस और गाजियाबाद पुलिस के बीच उन्हें रोकने को लेकर रणनीति बनने लगी। पहले काशी टोल प्लाजा पर रोकने की योजना बनी, फिर गाजियाबाद-दिल्ली बॉर्डर पर ही घेरने का फैसला हुआ। मकसद साफ था—किसी भी हालत में उन्हें कपसाढ़ गांव तक न पहुंचने दिया जाए। इस दौरान आज़ाद समाज पार्टी के कार्यकर्ता अलग-अलग जगहों पर अलर्ट मोड में थे और हर मूवमेंट पर नजर रख रहे थे।
पुलिस ने रोका तो पैदल दौड़
गाजीपुर बॉर्डर पर पुलिस ने सांसद की गाड़ी रोक दी। यह वही जगह थी जहां पहले किसान आंदोलन चला था। जैसे ही गाड़ी रुकी, चंद्रशेखर आज़ाद बाहर निकले और पैदल ही आगे बढ़ने लगे। पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की, धक्का-मुक्की हुई और यह सिलसिला करीब दो किलोमीटर तक चला। सांसद रुके नहीं। तभी रास्ते में एक बाइक सवार मिला, जिसने उन्हें लिफ्ट दे दी। इसके बाद वे हाईवे छोड़कर कच्चे-पक्के रास्तों और गांवों के बीच से आगे बढ़ते रहे। उधर, पुलिस काशी टोल प्लाजा से गुजरने वाली हर गाड़ी की तलाशी ले रही थी। टोल प्लाजा पर पहले से मौजूद सैकड़ों कार्यकर्ताओं को संदेश मिला और देखते ही देखते वहां धरना शुरू हो गया। एक घंटे तक सस्पेंस बना रहा कि क्या सांसद यहां तक पहुंच पाएंगे या पहले ही गिरफ्तार हो जाएंगे।
रुमाल से ढका चेहरा, टोल प्लाजा पर एंट्री और उठते सवाल
अचानक, मुंह पर रुमाल बांधे चंद्रशेखर आज़ाद अपने दो साथियों के साथ काशी टोल प्लाजा पर दिखाई दिए। यह पल उनके समर्थकों के लिए किसी जीत से कम नहीं था। सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने उन्हें घेर लिया, वहीं पुलिस भी चारों ओर से तैनात हो गई। चंद्रशेखर आज़ाद ने साफ कहा कि वे कानून और पुलिस का सम्मान करते हैं, लेकिन उनके साथ जबरदस्ती न की जाए। उन्होंने कहा कि वे चाहें तो कच्चे रास्तों से सीधे गांव पहुंच सकते थे, लेकिन वे कानूनी तरीके से ही पीड़ित परिवार से मिलना चाहते हैं। बढ़ते दबाव के बीच आखिरकार पुलिस को रास्ता निकालना पड़ा। देर रात खबर आई कि आरोपी गिरफ्तार कर लिया गया है और अपहृत लड़की को सकुशल बरामद कर लिया गया है। इसके बाद चंद्रशेखर आज़ाद की पीड़ित परिवार से मुलाकात करवाई गई। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल छोड़ दिया—जब एक सांसद को पीड़ित परिवार से मिलने के लिए इस हद तक संघर्ष करना पड़े, तो आम दलित नागरिकों के साथ व्यवस्था का व्यवहार कैसा होता होगा? यही सवाल इस मामले को सिर्फ एक अपराध की खबर नहीं, बल्कि सिस्टम की परीक्षा बना देता है।
