रायबरेली: UGC के नए नियमों के बाद अब उत्तर प्रदेश के रायबरेली में विरोध तेज हो गया है। बीजेपी और हिंदू संगठनों ने नेताओं को चेतावनी देने के लिए चूड़ियां भेजने की तैयारी शुरू कर दी है। ये चूड़ियां उन नेताओं को दी जाएंगी, जिन्होंने नए नियमों के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई। सवर्ण समाज का कहना है कि नए नियमों से उनके बच्चों के पढ़ाई के अवसर कम हो सकते हैं और उन्हें नुकसान पहुंच सकता है।
UGC ने नए नियम इसलिए बनाए हैं ताकि कॉलेज और यूनिवर्सिटीज में किसी के साथ जाति के आधार पर भेदभाव न हो। इसमें कुछ सख्त प्रावधान हैं, जो आरक्षित वर्ग को प्राथमिकता देते हैं। सवर्ण समाज का कहना है कि इससे उनकी आवाज़ दब सकती है और नियम उनके खिलाफ इस्तेमाल हो सकता है।
नेताओं को चूड़ियां भेजने की तैयारी क्यों?
रायबरेली के बीजेपी किसान नेता रमेश बहादुर सिंह ने कहा, “परिवार पहले, पार्टी बाद में। मैं 40 साल से बीजेपी से जुड़ा हूं। अब नेताओं की निष्ठा पर सवाल उठ रहे हैं।” उनका कहना है कि सांसदों, विधायकों और मंत्रियों को चेतावनी देने के लिए चूड़ियां भेजी जाएंगी। इसका उद्देश्य यह दिखाना है कि नेताओं को जनता और अपने परिवार की भी जिम्मेदारी समझनी चाहिए।
संगठनों का कहना है कि कई नेता अपने बच्चों को विदेश में पढ़ाते हैं और नियमों का विरोध नहीं कर रहे। वहीं, स्थानीय सवर्ण समाज का कहना है कि नियम लागू होने पर उनके बच्चों के पढ़ाई और भविष्य पर असर पड़ेगा। इसलिए वे इस तरह की चेतावनी दे रहे हैं।
महिलाओं को आगे लाने की रणनीति
रायबरेली के हिंदू संगठन, गौ रक्षा दल के नेता महेंद्र पांडेय ने कहा कि चूड़ियां इसलिए भेजी जा रही हैं ताकि महिलाएं आगे आएं। उनका कहना है कि नेताओं से कुछ नहीं हो रहा, इसलिए अब घर की महिलाएं ही देश और समाज की रक्षा करें। पांडेय ने कहा कि नियमों से सवर्ण समाज के बच्चों पर असर पड़ेगा और उन्हें बिना मौका दिए सजा दी जाएगी।
संगठनों का कहना है कि यह केवल चेतावनी है, किसी को अपमानित करना मकसद नहीं है। वे चाहते हैं कि सांसद और विधायक जनता की आवाज़ सुनें और परिवार के लिए भी जिम्मेदारी लें।
राजनीति और विरोध का असर
UGC के नए नियमों को लेकर रायबरेली में यह विरोध अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया है। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि अगर विरोध जारी रहा, तो BJP को भी अपने नेताओं के बीच संतुलन बनाने के लिए कदम उठाने पड़ सकते हैं। UGC और सरकार की तरफ से अब तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।
रायबरेली का यह मामला शिक्षा, जाति और राजनीति को जोड़कर देशभर में चर्चा का विषय बन गया है। आने वाले दिनों में यह देखा जाएगा कि सांसद और विधायक इस चेतावनी को कैसे लेते हैं और क्या यह आंदोलन पूरे प्रदेश में फैलता है या नहीं।
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