लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) परिसर में बनी मजारों को हटाने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन ने 15 दिन का नोटिस जारी किया है। इस नोटिस के सामने आते ही लखनऊ में विवाद तेज हो गया है। प्रशासन का कहना है कि परिसर के अंदर बनी ये मजारें अवैध हैं और विश्वविद्यालय की जमीन पर अतिक्रमण के दायरे में आती हैं। नोटिस में साफ लिखा गया है कि तय समय के अंदर मजारें नहीं हटाई गईं तो पुलिस की मदद से इन्हें गिराया जाएगा। इसके साथ ही कार्रवाई में होने वाले खर्च की वसूली भी संबंधित लोगों से की जाएगी। प्रशासन का तर्क है कि KGMU की जमीन शिक्षा और इलाज से जुड़े कामों के लिए है और वहां किसी भी तरह का अवैध निर्माण नियमों के खिलाफ है। हालांकि, इतने वर्षों बाद अचानक नोटिस जारी होने से लोगों में नाराजगी बढ़ गई है और मामला अब सिर्फ प्रशासनिक नहीं रह गया है।
600 साल पुरानी मजारों का दावा और आस्था की बात
लखनऊ में नोटिस के विरोध में समाजवादी पार्टी, मुस्लिम संगठन और कई सामाजिक समूह सामने आए हैं। शाहमीना शाह इलाके में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में वक्ताओं ने दावा किया कि KGMU परिसर में मौजूद मजारें करीब 600 साल पुरानी हैं। उनका कहना है कि इन मजारों का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व है और ये लंबे समय से लोगों की आस्था का केंद्र रही हैं। वक्ताओं ने बताया कि यहां सिर्फ मुस्लिम ही नहीं, बल्कि हर धर्म के लोग दुआ और मन्नत के लिए आते रहे हैं। ऐसे में इन्हें अवैध बताकर हटाने की बात लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली है। विरोध करने वालों ने सवाल उठाया कि अगर मजारें अवैध थीं तो इतने सालों तक प्रशासन ने कोई कार्रवाई क्यों नहीं की। अचानक नोटिस जारी होना कई सवाल खड़े करता है और इससे सामाजिक सौहार्द पर भी असर पड़ सकता है।
सपा और संगठनों का विरोध, आंदोलन की चेतावनी
लखनऊ में समाजवादी पार्टी ने इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए सरकार और KGMU प्रशासन पर सवाल उठाए हैं। सपा नेताओं का कहना है कि यह सिर्फ जमीन या नियमों का मामला नहीं है, बल्कि इससे लाखों लोगों की धार्मिक आस्था जुड़ी हुई है। पार्टी ने चेतावनी दी है कि अगर मजारों को हटाने की कोशिश की गई तो वह सड़कों पर उतरकर विरोध करेगी। प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद मुस्लिम संगठनों के पदाधिकारियों ने भी इसे आस्था पर हमला बताया और कहा कि संविधान हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता देता है। सामाजिक कार्यकर्ता रविदास मल्होत्रा ने कहा कि किसी एक समुदाय की आस्था को चोट पहुंचाने से समाज में तनाव बढ़ता है। वहीं मौलाना कल्बे जवाद समेत कई धर्मगुरुओं ने सरकार से अपील की कि वह इस मामले में हस्तक्षेप करे और प्रशासन को कार्रवाई से रोके। उनका कहना है कि जल्दबाजी में लिया गया फैसला भविष्य में बड़े सामाजिक विवाद का कारण बन सकता है।
सरकार से उम्मीद और आगे की राह
लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह भी ऐलान किया गया कि मजारों को बचाने के लिए सरकार को ज्ञापन सौंपा जाएगा। इसके लिए एक प्रतिनिधिमंडल बनाया जाएगा, जो मुख्यमंत्री और संबंधित मंत्रियों से मिलकर अपना पक्ष रखेगा। विरोध करने वालों का कहना है कि वे कानूनी तरीके से इस मुद्दे को आगे बढ़ाएंगे और मजारों की सुरक्षा के लिए हर संभव कोशिश करेंगे। दूसरी ओर, KGMU प्रशासन का कहना है कि वह नियमों के अनुसार ही काम कर रहा है और परिसर में किसी भी तरह के अतिक्रमण को हटाना उसकी जिम्मेदारी है। प्रशासन का तर्क है कि अगर आज नियमों को नजरअंदाज किया गया तो भविष्य में विश्वविद्यालय की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। अब सभी की नजरें सरकार पर टिकी हैं कि वह इस मामले में क्या रुख अपनाती है। क्या सरकार बीच का रास्ता निकाल पाएगी या फिर यह विवाद और बड़ा रूप लेगा, इसका जवाब आने वाले दिनों में सामने आएगा।
Read More-मुंबई मेट्रो में वरुण धवन का स्टंट! पुल-अप्स वीडियो वायरल, मेट्रो अथॉरिटी ने दी चेतावनी
