प्रयागराज के माघ मेले में इस बार आस्था के साथ-साथ वैभव की झलक भी चर्चा का विषय बनी हुई है। गुरुवार को माघ मेले में संतोष दास जी महाराज उर्फ सतुआ बाबा जब बुलडोजर पर सवार होकर पहुंचे, तो वहां मौजूद श्रद्धालु और मीडिया दोनों ही चौंक गए। बुलडोजर के दोनों ओर पोर्शे और लैंड रोवर डिफेंडर जैसी लग्ज़री गाड़ियां साथ चलती दिखीं। इस दृश्य का वीडियो देखते ही देखते सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। आमतौर पर संतों को सादगी से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन सतुआ बाबा की यह मौजूदगी लोगों के लिए बिल्कुल अलग अनुभव रही। माघ मेले में जहां साधु-संत गेरुए वस्त्रों में पैदल या साधारण वाहनों से आते दिखते हैं, वहीं बुलडोजर, महंगी कारें और सुरक्षा व्यवस्था ने सतुआ बाबा को चर्चा के केंद्र में ला दिया। यही वजह है कि अब हर कोई जानना चाहता है कि आखिर सतुआ बाबा हैं कौन और उनके पास ऐसा क्या है, जो उन्हें बाकी संतों से अलग बनाता है।
डिफेंडर और पोर्शे ही नहीं, वैभव की लंबी फेहरिस्त
अगर आपको लगता है कि सतुआ बाबा के पास सिर्फ डिफेंडर और पोर्शे जैसी कारें ही हैं, तो यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती। सतुआ बाबा की तस्वीरें और वीडियो समय-समय पर सोशल मीडिया पर सामने आते रहते हैं, जिनमें वह कभी प्राइवेट जेट में यात्रा करते दिखते हैं तो कभी महंगी गाड़ियों के काफिले के साथ। बताया जाता है कि उनके पास कई लग्ज़री वाहन हैं, जो आमतौर पर फिल्मी सितारों या बड़े उद्योगपतियों के पास ही देखने को मिलते हैं। हालांकि सतुआ बाबा खुद को वैभव का प्रदर्शन करने वाला संत नहीं मानते, लेकिन उनके साथ दिखने वाले संसाधन लोगों के बीच जिज्ञासा पैदा करते हैं। समर्थकों का कहना है कि यह सब सनातन परंपरा के वैभव का प्रतीक है, जबकि आलोचक इसे दिखावा बताते हैं। सच जो भी हो, लेकिन इतना तय है कि सतुआ बाबा का नाम अब सिर्फ आध्यात्मिक गलियारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सोशल मीडिया और मुख्यधारा की खबरों में भी छा चुका है।
पीले वस्त्रों वाले संत और सत्ता के गलियारों में पहचान
सतुआ बाबा, जिनका असली नाम संतोष दास जी महाराज है, अक्सर पीले वस्त्रों में नजर आते हैं। उन्हें कई मौकों पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आसपास देखा गया है, जिसके चलते लोग उन्हें सत्ता के करीबी संत के रूप में भी पहचानते हैं। काशी के रहने वाले सतुआ बाबा को लेकर यह धारणा बनी कि वह मुख्यमंत्री योगी के विशेष निकट हैं, हालांकि इस पर कोई औपचारिक बयान सामने नहीं आया है। फिर भी सार्वजनिक कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी और प्रभावशाली लोगों से उनके संबंधों की चर्चा होती रहती है। माघ मेले से पहले भी वह कई धार्मिक आयोजनों में अपने अलग अंदाज के कारण सुर्खियों में रहे हैं। उनके समर्थक उन्हें सनातन संस्कृति का आधुनिक प्रतिनिधि मानते हैं, जो परंपरा और वर्तमान समय के संसाधनों को साथ लेकर चलते हैं। यही वजह है कि सतुआ बाबा का व्यक्तित्व जितना आध्यात्मिक है, उतना ही रहस्यमय भी।
1803 से जुड़ी पीठ और मणिकर्णिका घाट का आश्रम
सतुआ बाबा की पहचान सिर्फ उनकी गाड़ियों या वायरल वीडियो तक सीमित नहीं है। काशी के मणिकर्णिका घाट पर स्थित उनका स्थायी आश्रम उनकी असली पहचान का केंद्र माना जाता है। दूर से दिखाई देने वाली यह इमारत उस पीठ का हिस्सा है, जिसकी स्थापना साल 1803 में हुई थी। इस पीठ की नींव गुजरात के रहने वाले संत जेठा पटेल ने रखी थी। कहा जाता है कि जेठा पटेल ने सांसारिक जीवन त्यागकर संन्यास लिया और काशी आकर इस आश्रम की स्थापना की। समय के साथ इस पीठ के मुखिया को ‘सतुआ बाबा’ कहा जाने लगा। यहां बटुकों को वैदिक शिक्षा दी जाती है और सनातन परंपराओं का पालन कराया जाता है। आज इसी पीठ के वर्तमान मुखिया संतोष दास जी महाराज हैं, जिन्हें लोग सतुआ बाबा के नाम से जानते हैं। माघ मेले में बुलडोजर से लेकर लग्ज़री कारों तक दिखा वैभव चाहे जितना चौंकाने वाला हो, लेकिन इसके पीछे 200 साल से ज्यादा पुरानी आध्यात्मिक परंपरा भी जुड़ी हुई है, जो सतुआ बाबा को अलग पहचान देती है।
