आज भले ही दुनिया की नजरें ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव पर टिकी हों, लेकिन भारत और ईरान के रिश्तों में एक दिलचस्प सिनेमाई अध्याय भी जुड़ा हुआ है। करीब 55 साल पहले हिंदी सिनेमा में एक ऐसी फिल्म बनी थी जिसने दोनों देशों की फिल्म इंडस्ट्री को एक साथ जोड़ दिया था। साल 1971 में रिलीज हुई फिल्म ‘सुबह-ओ-शाम’ उस दौर की एक अनोखी फिल्म मानी जाती है। इस फिल्म में हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता संजीव कुमार और मशहूर अभिनेत्री वहीदा रहमान के साथ ईरान के बड़े स्टार मोहम्मद अली फरदीन भी नजर आए थे। यही वजह है कि यह फिल्म उस समय भारत और ईरान के सांस्कृतिक रिश्तों की खास मिसाल बन गई थी।
तेहरान के सुपरस्टार के छोटे भाई बने थे संजीव कुमार
फिल्म ‘सुबह-ओ-शाम’ का निर्देशन इंडो-ईरानियन फिल्ममेकर तापी चाणक्य ने किया था। उस दौर में विदेशों में शूटिंग करना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी, लेकिन इस फिल्म की शूटिंग ईरान की कई खूबसूरत लोकेशनों पर की गई थी। फिल्म की कहानी में एक खास मोड़ भी था। इसमें संजीव कुमार ने ईरान के मशहूर अभिनेता मोहम्मद अली फरदीन के छोटे भाई का किरदार निभाया था। इस तरह फिल्म की कहानी में भारतीय और ईरानी किरदारों का मेल दिखाई देता है। फिल्म में सिमिन गफ्फारी, लोरेटा, इरीन और अजर जैसे कई ईरानी कलाकार भी नजर आए थे, जिससे यह फिल्म दोनों देशों की कला और कलाकारों के सहयोग का बेहतरीन उदाहरण बन गई।
संगीत ने भी दिलों में बनाई खास जगह
इस फिल्म की कहानी जितनी दिलचस्प थी, उतना ही शानदार इसका संगीत भी था। मशहूर संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने फिल्म को बेहतरीन धुनों से सजाया, जबकि गीतकार आनंद बख्शी ने इसके गानों को खास अंदाज में लिखा। उस दौर के दिग्गज गायकों ने अपनी आवाज से इन गीतों को यादगार बना दिया। लता मंगेशकर, किशोर कुमार, आशा भोसले और मोहम्मद रफी जैसे बड़े नाम फिल्म के गानों से जुड़े थे। मोहम्मद रफी की आवाज में गाए गए गाने ‘छोड़ मुझे पीने दे’, ‘साकी की जरूरी है’ और ‘तेरी मेरी नजर लड़ गई’ उस समय लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हुए थे।
ईरान में भी मिली थी बड़ी सफलता
दिलचस्प बात यह है कि इस फिल्म को ईरान में भी रिलीज किया गया था। वहां इसका नाम ‘होमाये सादात’ रखा गया था। ईरानी दर्शकों ने भी इस फिल्म को काफी पसंद किया और यह वहां भी चर्चा में रही। फिल्म की सफलता के बाद कई भारतीय फिल्ममेकरों ने ईरान की खूबसूरत लोकेशनों में शूटिंग करने में दिलचस्पी दिखाई। आज जब अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ईरान का नाम बार-बार सुर्खियों में आ रहा है, तब यह 55 साल पुरानी फिल्म एक बार फिर याद दिलाती है कि सिनेमा हमेशा देशों और संस्कृतियों को जोड़ने का काम करता रहा है।
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