उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों का इंतजार कर रहे करोड़ों लोगों और संभावित उम्मीदवारों के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बहुत बड़ा और स्पष्ट निर्देश जारी किया है। कोर्ट की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग को अगले तीन महीने के भीतर हर हाल में चुनाव संपन्न कराने का आदेश दिया है। इस फैसले के बाद प्रदेश की ग्रामीण राजनीति में हलचल काफी तेज हो गई है, क्योंकि अब प्रशासन और सरकार के पास चुनाव की तैयारियों के लिए बहुत कम वक्त बचा है।
सरकार का फैसला वैध, प्रशासक बने रहेंगे प्रधान
याचिकाओं में योगी सरकार के उस शासनादेश को चुनौती दी गई थी जिसमें कार्यकाल पूरा होने के बाद निवर्तमान ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक नियुक्त किया गया था। इस मामले पर सुनवाई करते हुए जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस गरिमा प्रसाद की डिवीजन बेंच ने सरकार के फैसले को पूरी तरह वैध करार दिया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि जब तक नए चुनाव नहीं हो जाते, तब तक मौजूदा निवर्तमान प्रधान ही प्रशासक के रूप में कार्यभार संभालते रहेंगे, हालांकि राज्य सरकार को निर्वाचन आयोग को निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए सभी जरूरी संसाधन मुहैया कराने होंगे।
ओबीसी कमीशन की रिपोर्ट पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
इस पूरी कानूनी प्रक्रिया के दौरान ओबीसी आयोग की रिपोर्ट को लेकर भी कोर्ट ने तीखी टिप्पणी की। अदालत ने असंतोष जताते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि रिपोर्ट धरातल पर जाकर तैयार करने के बजाय केवल दफ्तर में बैठकर बनाई गई है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि आयोग अपना काम आगे भी जारी रखेगा, लेकिन पंचायत चुनावों को इस रिपोर्ट के पूरा होने का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। चुनाव मौजूदा नियमों और तय 27 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान के तहत ही कराए जाएंगे।
तीन महीने की डेडलाइन, समय सीमा नहीं बढ़ेगी
याचियों के वकीलों के मुताबिक, कोर्ट ने राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग को दो टूक शब्दों में निर्देश दिया है कि किसी भी परिस्थिति में तीन महीने की समयसीमा बढ़ाई नहीं जाएगी। अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने भी स्पष्ट किया कि कानून में निहित प्रावधानों के तहत ही प्रशासकों की नियुक्ति की गई थी जिसे कोर्ट ने सही माना है। अब सभी की निगाहें चुनाव आयोग पर टिकी हैं कि वह कितनी जल्दी जमीनी स्तर पर चुनावी तारीखों का ऐलान करता है और गांवों की सरकार चुनने की प्रक्रिया शुरू होती है।
