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3000 लोग लापता, तबाही के बाद चीन से भिड़ा नेपाल… ग्लेशियर डेटा को लेकर बड़ा खुलासा

Nepal Flood: भीषण बाढ़ के बाद नेपाल ने चीन पर ग्लेशियर और नदी डेटा समय पर नहीं देने का आरोप लगाया है। चीन ने दावा खारिज कर समय पर बारिश का अलर्ट देने की बात कही।

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Nepal Flood: नेपाल में 26 अगस्त को आई भीषण बाढ़ के बाद अब प्राकृतिक आपदा से ज्यादा सवाल समय पर चेतावनी मिलने को लेकर उठ रहे हैं। नेपाल और चीन के बीच ग्लेशियर, मौसम और नदियों से जुड़े आंकड़ों को साझा करने को लेकर मतभेद सामने आया है। नेपाल का आरोप है कि चीन से उसे ग्लेशियरों की स्थिति और नदियों के जलस्तर की पर्याप्त जानकारी समय पर नहीं मिली। दूसरी ओर चीन ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि जरूरी मौसम संबंधी चेतावनी नेपाल के साथ पहले ही साझा की गई थी। इस आपदा में बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए हैं और करीब 3000 से ज्यादा लोगों के अब भी लापता होने की जानकारी सामने आई है।

नेपाल ने क्यों उठाए चीन पर सवाल?

नेपाल के मुताबिक, सीमा से लगे हिमालयी इलाकों में ग्लेशियरों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखना बेहद जरूरी है। खासकर मानसून के दौरान भारी बारिश के साथ ग्लेशियर टूटने, भूस्खलन और अचानक नदियों का जलस्तर बढ़ने का खतरा रहता है। नेपाल का कहना है कि उसने चीन से ग्लेशियरों की हलचल, नदी के पानी और बारिश से जुड़ा विस्तृत डेटा मांगा था, लेकिन उसे अपेक्षित स्तर की जानकारी नहीं मिल सकी। नेपाल के जलविज्ञान विभाग का कहना है कि केवल भारी बारिश का पूर्वानुमान किसी बड़ी आपदा से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं है। अधिकारियों को ग्लेशियर की स्थिति और नदी के जलस्तर में होने वाले बदलाव की लगातार जानकारी मिलनी चाहिए, ताकि खतरे वाले इलाकों में लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर भेजा जा सके।

भारत की तरह डेटा शेयरिंग समझौता चाहता है नेपाल

इस घटना के बाद नेपाल अब चीन के साथ मौसम और नदियों से जुड़े आंकड़ों की बेहतर व्यवस्था बनाने पर जोर दे रहा है। नेपाल की इच्छा है कि चीन के साथ भी ऐसी व्यवस्था हो, जिसमें महत्वपूर्ण नदियों, जलस्तर और मौसम से जुड़ा डेटा नियमित अंतराल पर साझा किया जाए। भारत के साथ नेपाल को पहले से इस तरह की जानकारी मिलने की व्यवस्था का उदाहरण दिया जा रहा है। नेपाल का मानना है कि सीमावर्ती इलाकों में आने वाली बाढ़ का असर कई बार नीचे बसे क्षेत्रों तक पहुंचता है। ऐसे में अगर ऊपर के हिस्से में ग्लेशियर टूटने या नदी का पानी अचानक बढ़ने की जानकारी पहले मिल जाए तो प्रशासन राहत और बचाव की तैयारी कर सकता है। मई में काठमांडू में दोनों देशों के अधिकारियों के बीच प्राकृतिक आपदाओं से जुड़े जोखिम कम करने के मुद्दे पर बैठक भी हुई थी। इसके कुछ ही महीने बाद यह घटना सामने आने से डेटा शेयरिंग का मुद्दा और गंभीर हो गया है।

चीन बोला- समय पर दी थी भारी बारिश की चेतावनी

नेपाल के आरोपों पर चीन ने अलग पक्ष रखा है। चीन के दूतावास का कहना है कि उसने जरूरी जानकारी नेपाल के साथ समय पर साझा की थी। चीनी पक्ष के मुताबिक, हादसे से करीब 12 दिन पहले उसके मौसम केंद्र ने नेपाल को ईमेल के जरिए भारी बारिश और भूस्खलन जैसे संभावित खतरों को लेकर चेतावनी भेजी थी। चीन का कहना है कि नेपाल-तिब्बत सीमा का हिमालयी क्षेत्र बेहद दुर्गम है और वहां लगातार निगरानी करना आसान नहीं है। ऊंचाई, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और सीमित निगरानी संसाधनों के कारण ग्लेशियर और मौसम की गतिविधियों पर नजर रखना चुनौतीपूर्ण रहता है। हालांकि, नेपाल का कहना है कि उसे केवल सामान्य मौसम चेतावनी के बजाय ज्यादा सटीक और लगातार अपडेट की जरूरत है। यही अंतर अब दोनों देशों के दावों के बीच मुख्य मुद्दा बना हुआ है।

बाढ़ के बाद बढ़ी चिंता, हजारों लोगों की तलाश जारी

26 अगस्त की घटना के बाद नेपाल में राहत और बचाव अभियान तेज किया गया है। बाढ़ और इससे जुड़ी तबाही ने कई इलाकों में जनजीवन को प्रभावित किया है। बड़ी संख्या में लोग सुरक्षित स्थानों की ओर जाने को मजबूर हुए हैं, जबकि करीब 3000 से अधिक लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई है। इस घटना ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों में आपदा से पहले मिलने वाली चेतावनी की अहमियत को सामने ला दिया है। नेपाल के सामने अब दो बड़ी चुनौतियां हैं—लापता लोगों को तलाशना और भविष्य में ऐसी घटनाओं के लिए बेहतर चेतावनी प्रणाली तैयार करना। वहीं चीन और नेपाल के बीच डेटा साझा करने को लेकर पैदा हुआ विवाद आगे किस दिशा में जाता है, इस पर भी नजर बनी हुई है। अगर दोनों देश ग्लेशियर, बारिश और नदी के जलस्तर से जुड़ी जानकारी साझा करने की मजबूत व्यवस्था बनाते हैं, तो भविष्य में ऐसी आपदाओं के दौरान समय रहते लोगों को बचाने में मदद मिल सकती है।

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