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चीनी के बढ़ते दाम पर सरकार का बड़ा एक्शन, अब बदल दिया ये बड़ा नियम

चीनी की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने आयात नियम सख्त कर दिए हैं। अब इंपोर्टेड कच्ची चीनी को 60 दिन के भीतर रिफाइंड कर बाजार में बेचना होगा।

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देश में चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी के बीच सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। विदेश से आयात की जाने वाली कच्ची चीनी को अब लंबे समय तक गोदाम में रखकर नहीं रखा जा सकेगा। नए नियम के अनुसार, टैरिफ रेट कोटा (TRQ) के तहत आयात की गई कच्ची चीनी को पहले रिफाइंड करना होगा और इसके बाद उसे घरेलू बाजार में बिक्री के लिए उतारना होगा। इसके लिए सरकार ने 60 दिनों की समयसीमा तय की है। यानी बिल ऑफ एंट्री की तारीख से दो महीने के भीतर आयातित चीनी को प्रोसेस कर बाजार में पहुंचाना जरूरी होगा। पहले इसे 31 अक्टूबर 2026 तक बाजार में बेचने की शर्त थी, लेकिन अब समयसीमा घटा दी गई है।

10 लाख टन चीनी आयात की मंजूरी, स्टॉक पर भी नजर

सरकार ने कीमतों को नियंत्रित करने और बाजार में सप्लाई बढ़ाने के लिए 31 अक्टूबर 2026 तक 10 लाख टन चीनी के आयात की अनुमति दी है। इसके साथ ही व्यापारियों और बड़े खरीदारों के लिए चीनी का स्टॉक रखने की सीमा भी तय की गई है। इसमें सॉफ्ट ड्रिंक और आइसक्रीम बनाने वाली बड़ी कंपनियां भी शामिल हैं। सरकार का मकसद आयातित चीनी को लंबे समय तक स्टोर करने की संभावना को कम करना है, ताकि ज्यादा मात्रा में चीनी बाजार में उपलब्ध रहे। राज्यों को भी जमाखोरी और कालाबाजारी पर नजर रखने के निर्देश दिए गए हैं। जरूरत पड़ने पर नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

देश में चीनी की कमी नहीं, फिर क्यों बढ़ी कीमतों की चिंता?

चीनी उद्योग संगठन ISMA के मुताबिक देश में फिलहाल इतनी चीनी उपलब्ध है कि घरेलू मांग को पूरा किया जा सके। शुरुआती स्टॉक करीब 50 लाख टन था, जबकि देश में सालाना चीनी की खपत करीब 280 से 285 लाख टन रहने का अनुमान है। इथेनॉल उत्पादन में चीनी के इस्तेमाल के बाद इस सीजन का नेट चीनी उत्पादन करीब 279 लाख टन रहने का अनुमान है। वहीं 2025-26 के कुल उत्पादन का अनुमान घटकर करीब 306 लाख टन कर दिया गया है, जबकि पहले 343 लाख टन का अनुमान था। गन्ने की फसल पर कीटों के हमले और ज्यादा बारिश के कारण खेतों में पानी भरने को उत्पादन घटने की प्रमुख वजह माना जा रहा है। सरकार को उम्मीद है कि आयात और स्टॉक से जुड़े नए नियमों से बाजार में सप्लाई बेहतर होगी और कीमतों पर दबाव कम होगा।

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