इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खालिस्तान कमांडो फोर्स (KCF) से जुड़े बताए जा रहे सुखविंदर सिंह ढिल्लो को 1993 के आर्म्स एक्ट मामले में सशर्त जमानत दे दी है। करीब 31 वर्षों तक फरार रहने के बाद उसे फरवरी 2026 में उत्तर प्रदेश एंटी टेररिज्म स्क्वाड (ATS) और गौतमबुद्ध नगर पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में पंजाब के मोहाली से गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद से वह न्यायिक हिरासत में था। अदालत ने जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान उपलब्ध दस्तावेजों और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत का फैसला मामले के अंतिम निष्कर्ष पर आधारित नहीं है, बल्कि प्रथम दृष्टया उपलब्ध तथ्यों को देखते हुए लिया गया है। अब इस फैसले के बाद यह मामला फिर से चर्चा में आ गया है।
अदालत ने क्यों माना कि आरोपी जानबूझकर फरार नहीं था?
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि समय के साथ संबंधित थाना क्षेत्र और प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव हुए, जिससे केस से जुड़े रिकॉर्ड और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हुई। वकील का कहना था कि इन परिस्थितियों के कारण आरोपी को अदालत की कार्यवाही की पूरी जानकारी नहीं मिल सकी। अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड का अध्ययन करने के बाद माना कि प्रथम दृष्टया यह नहीं कहा जा सकता कि आरोपी ने जानबूझकर अदालत की प्रक्रिया से बचने की कोशिश की। कोर्ट ने यह भी माना कि उसके खिलाफ पहले मिली जमानत का दुरुपयोग करने के पर्याप्त आधार इस स्तर पर सामने नहीं आए। हालांकि अदालत ने साफ किया कि यह टिप्पणी केवल जमानत पर फैसला सुनाने तक सीमित है और ट्रायल के दौरान सभी तथ्यों की स्वतंत्र रूप से जांच होगी।
1993 के मामले में AK-56 और कारतूस बरामद होने का आरोप
यह मामला वर्ष 1993 का है, जब तत्कालीन गाजियाबाद जिले के थाना सेक्टर-20 क्षेत्र में आर्म्स एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। पुलिस के अनुसार उस समय सुखविंदर सिंह ढिल्लो के पास से एक AK-56 राइफल और कई जिंदा कारतूस बरामद किए गए थे। गिरफ्तारी के बाद उसे जमानत मिल गई थी, लेकिन बाद में वह अदालत में पेश नहीं हुआ और उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया गया। इसके बाद वह कई वर्षों तक पुलिस की पहुंच से बाहर रहा। फरवरी 2026 में सुरक्षा एजेंसियों को उसके मोहाली में होने की सूचना मिली, जिसके आधार पर उसे गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के बाद उसे अदालत में पेश किया गया और तब से वह जेल में बंद था।
सशर्त जमानत के साथ अदालत ने दी सख्त हिदायत
हाई कोर्ट ने जमानत देते हुए आरोपी पर कई शर्तें भी लगाई हैं। अदालत ने निर्देश दिया है कि वह मुकदमे के दौरान नियमित रूप से ट्रायल कोर्ट में उपस्थित रहेगा और किसी भी गवाह या साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ नहीं करेगा। यदि वह अदालत द्वारा तय किसी भी शर्त का उल्लंघन करता है, तो उसकी जमानत तत्काल रद्द की जा सकती है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट इस मामले में उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर पूरी तरह स्वतंत्र होकर फैसला सुनाएगी। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि जमानत मिलने का अर्थ यह नहीं है कि आरोपी दोषमुक्त हो गया है। मामले की अंतिम सच्चाई अब ट्रायल के दौरान सामने आएगी और उसी आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई तय होगी।
