इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यशैली पर कड़ा रुख अपनाते हुए राज्य सरकार पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। अदालत ने यह फैसला उस समय दिया जब एक जमानत याचिका के निस्तारण में पुलिस की लापरवाही के कारण 10 दिन से अधिक की देरी सामने आई। कोर्ट ने कहा कि किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में इस तरह की ढिलाई स्वीकार नहीं की जा सकती। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जुर्माने की राशि सीधे याचिकाकर्ताओं को दी जाएगी। साथ ही राज्य सरकार को यह अधिकार दिया गया है कि वह जांच के बाद दोषी अधिकारियों से इस रकम की वसूली कर सकती है। इस फैसले के बाद पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर चर्चा में आ गई है।
दहेज मृत्यु मामले की सुनवाई में सामने आई लापरवाही
यह मामला बिजनौर जिले के चांदपुर थाना क्षेत्र से जुड़ा है। दहेज मृत्यु से संबंधित एक केस में यासीन और सबीला नाम के दो आरोपियों की जमानत याचिका हाईकोर्ट में विचाराधीन थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने उपलब्ध दस्तावेजों और गवाहों के बयानों का अध्ययन किया। कोर्ट को ऐसा कोई मजबूत प्रमाण नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि मृतका को मौत से पहले दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ित किया गया था। इसके अलावा गवाहों के बयानों से यह भी संकेत मिला कि पति-पत्नी के बीच सामान्य घरेलू विवाद की स्थिति थी। इन तथ्यों को देखते हुए अदालत ने दोनों आरोपियों को जमानत देने का फैसला किया। लेकिन सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि पुलिस की ओर से समय पर जरूरी दस्तावेज और केस डायरी उपलब्ध नहीं कराई गई, जिसके कारण प्रक्रिया प्रभावित हुई।
कई बार निर्देश मिलने के बाद भी नहीं भेजी गई केस डायरी
अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, जमानत याचिका की प्रति जून महीने में ही संबंधित अधिकारियों तक पहुंचा दी गई थी। इसके बाद पुलिस विभाग को कई बार आवश्यक निर्देश और केस से जुड़े दस्तावेज भेजने के लिए कहा गया। बावजूद इसके समय पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष ने भी बताया कि उन्हें पुलिस से आवश्यक जानकारी प्राप्त नहीं हुई है। स्थिति को देखते हुए अदालत ने तत्काल केस डायरी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए, लेकिन इसके बावजूद संबंधित अधिकारियों की ओर से मूल दस्तावेज भेजने के बजाय केवल आरोपियों का आपराधिक रिकॉर्ड भेजा गया। कोर्ट ने इसे गंभीर लापरवाही माना और कहा कि इससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हुई। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि अगर पुलिस समय पर अपनी जिम्मेदारी निभाती तो मामले का निस्तारण पहले ही हो सकता था।
कोर्ट ने जांच और कार्रवाई के दिए आदेश
मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने संबंधित पुलिस अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया। सुनवाई के दौरान अधिकारियों ने अपने-अपने स्तर पर सफाई दी, लेकिन कोर्ट इन जवाबों से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुआ। अदालत ने कहा कि बार-बार सूचना मिलने और पर्याप्त समय होने के बावजूद आवश्यक कार्रवाई न करना बेहद चिंताजनक है। न्यायालय ने यह भी कहा कि इस तरह की लापरवाही से नागरिकों के संवैधानिक अधिकार प्रभावित होते हैं। इसी कारण कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 50 हजार रुपये का हर्जाना लगाया और संबंधित विभागों को मामले की जांच कराने का निर्देश दिया। साथ ही पुलिस महानिदेशक और बिजनौर पुलिस अधीक्षक को आदेश की प्रति भेजकर दोषी अधिकारियों के खिलाफ उचित कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा गया है। इस फैसले को न्यायिक जवाबदेही और प्रशासनिक जिम्मेदारी के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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