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आखरी सफर में दो देशों की सरहदें पार करेगा खामेनेई का पार्थिव शरीर, इस पवित्र जगह दी जाएगी अंतिम विदाई

अयातुल्लाह अली खामेनेई की अंतिम यात्रा दो देशों के पांच ऐतिहासिक शहरों से होकर गुजरेगी। जानिए तेहरान से शुरू होकर मशहद की पवित्र मिट्टी तक पहुंचने वाले इस सफर का पूरा रूट और इसके पीछे की बड़ी वजह।

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ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर दिवंगत अयातुल्लाह अली खामेनेई की राजकीय अंतिम यात्रा को लेकर एक बेहद खास और ऐतिहासिक खाका तैयार किया गया है। आगामी 4 जुलाई से शुरू होने वाला यह शोक जुलूस केवल एक विदाई नहीं, बल्कि ईरान के धार्मिक, राजनीतिक और वैचारिक शक्ति प्रदर्शन का प्रतीक होगा। इस सफर की शुरुआत राजधानी तेहरान से होने जा रही है, जहाँ शनिवार को ग्रैंड मोसाल्ला में दिवंगत नेता के पार्थिव शरीर को आम जनता के अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा। तेहरान की सड़कों से जब यह जुलूस गुजरेगा, तो यह देश के सत्ता केंद्र (संसद, राष्ट्रपति कार्यालय और सैन्य मुख्यालय) को एक अंतिम विदाई होगी, जो इस संवेदनशील मोड़ पर देश के नए नेतृत्व की निरंतरता को भी दर्शाएगा। इसके बाद यह जनाजा शिया शिक्षा के सबसे बड़े केंद्र ‘कोम’ ले जाया जाएगा, ताकि देश के शीर्ष धर्मगुरु और छात्र अपने मार्गदर्शक को अंतिम श्रद्धांजलि दे सकें।

सरहद पार इराक का रुख: कर्बला और नजफ में उमड़ेगा आस्था का सैलाब

ईरान की सीमाओं को पार करते हुए यह अंतिम संस्कार जुलूस पड़ोसी देश इराक के दो सबसे पवित्र शहरों में प्रवेश करेगा। इस फैसले ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। सबसे पहले जनाजे को कर्बला ले जाया जाएगा, जहाँ तीसरे शिया इमाम, इमाम हुसैन की पवित्र मजार स्थित है। कर्बला का यह रास्ता ईरान की उस वैचारिक सोच को पुख्ता करता है जो कुर्बानी और दृढ़ता की सीख देती है। इसके बाद जुलूस को इराक के ही नजफ शहर ले जाया जाएगा। नजफ, जहाँ पहले शिया इमाम, हजरत अली की मजार है, वैश्विक शिया विद्वता का सबसे प्रतिष्ठित गढ़ माना जाता है। इराक के इन दो ऐतिहासिक शहरों में अंतिम यात्रा के आयोजन से ईरान यह संदेश देना चाहता है कि अयातुल्लाह अली खामेनेई का प्रभाव केवल ईरान तक सीमित नहीं था, बल्कि सीमाओं के पार पूरी शिया कम्युनिटी में उन्हें एक बेहद सम्मानित दर्जा हासिल था।

जन्मभूमि की गोद में अंतिम विश्राम: मशहद में किया जाएगा सुपुर्द-ए-खाक

तमाम राजनीतिक और धार्मिक केंद्रों से होते हुए यह अंतिम यात्रा 9 जुलाई को अपने आखिरी पड़ाव पर पहुंचेगी। अयातुल्लाह अली खामेनेई को ईरान के सबसे पवित्र शहर मशहद में सुपुर्द-ए-खाक (दफन) किया जाएगा। मशहद का चुनाव बेहद भावुक और रणनीतिक है। दरअसल, मशहद न केवल खामेनेई की जन्मभूमि है, बल्कि यहीं उन्होंने अपने जीवन के शुरुआती और संघर्षपूर्ण साल बिताए थे। इस शहर में आठवें शिया इमाम, इमाम रजा की विश्व प्रसिद्ध मजार है, जहाँ हर साल करोड़ों जायरीन और श्रद्धालु मन्नतें मांगने आते हैं। अपनी मिट्टी से शुरू हुआ खामेनेई का सफर इसी पवित्र मजार की छांव में आकर हमेशा के लिए ठहर जाएगा। 4 जुलाई से शुरू होकर 9 जुलाई तक चलने वाली यह पूरी प्रक्रिया ईरान के इतिहास के सबसे बड़े शोक आयोजनों में से एक बनने जा रही है।

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