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भरत तिवारी एनकाउंटर में नया मोड़, क्या पुलिस कार्रवाई के पीछे छिपी है सच्चाई? मानवाधिकार आयोग ने मांगी हाई-लेवल रिपोर्ट

भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में बिहार मानवाधिकार आयोग ने संज्ञान लिया है। मुख्य सचिव और DGP से रिपोर्ट मांगी गई है। जानें पूरे मामले की ताजा अपडेट और आरोप।

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बिहार के भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र में हुए भरत भूषण तिवारी कथित एनकाउंटर मामले ने एक बार फिर तूल पकड़ लिया है। इस मामले में बिहार मानवाधिकार आयोग ने औपचारिक रूप से संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। यह कदम शिकायतों के आधार पर उठाया गया है, जिसमें पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। आयोग की इस कार्रवाई के बाद पूरे प्रशासनिक और पुलिस महकमे में हलचल बढ़ गई है।

 आयोग ने किन अधिकारियों से मांगी रिपोर्ट?

बिहार मानवाधिकार आयोग ने इस मामले में राज्य के शीर्ष अधिकारियों से तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी है। इसमें मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक (DGP) और भोजपुर के पुलिस अधीक्षक शामिल हैं। आयोग ने सभी संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे मामले से जुड़ी पूरी जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करें, ताकि घटनाक्रम की वास्तविकता स्पष्ट हो सके। आयोग के अध्यक्ष जस्टिस ए. एम. बदर ने करीब चार सप्ताह के भीतर रिपोर्ट जमा करने का समय निर्धारित किया है और अगली सुनवाई 13 जुलाई को तय की गई है।

शिकायत में क्या लगाए गए हैं आरोप?

मानवाधिकार मामलों के अधिवक्ता एस. के. झा द्वारा दर्ज शिकायत में पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। आरोप के अनुसार, भरत भूषण तिवारी ने कथित तौर पर पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था, इसके बावजूद उन्हें गोली मार दी गई, जिससे उनकी मौत हो गई। शिकायत में इसे फर्जी एनकाउंटर बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की गई है। आरोप यह भी है कि पुलिस कार्रवाई नियमों के विपरीत थी और मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ है।

आगे की प्रक्रिया और जांच पर नजर

आयोग ने स्पष्ट किया है कि सभी संबंधित दस्तावेज और रिपोर्ट मिलने के बाद मामले की गहन समीक्षा की जाएगी और आगे की कानूनी प्रक्रिया तय होगी। आयोग के रजिस्ट्रार, सेवानिवृत्त जिला जज शैलेंद्र सिंह ने कहा है कि प्राप्त रिपोर्टों के आधार पर निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाएगा। फिलहाल इस मामले में सभी की नजर 13 जुलाई की सुनवाई पर टिकी हुई है, जहां से जांच की दिशा और स्पष्ट हो सकती है। यह मामला अब मानवाधिकार और पुलिस कार्रवाई की पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है।

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