2016 का आदेश और बड़ा विवाद
जांच में सामने आया है कि जिस इमारत में आग लगी, उसे साल 2016 में अवैध निर्माण के चलते ध्वस्त करने का आदेश दिया गया था। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि यह आदेश कुछ ही महीनों बाद वापस ले लिया गया। अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर किसके दबाव में यह निर्णय बदला गया। इमारत का निर्माण मानचित्र के विपरीत किया गया था, फिर भी वर्षों तक इसमें गतिविधियां चलती रहीं। यह मामला अब सीधे लखनऊ विकास प्राधिकरण और संबंधित विभागों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
अब तक क्या हुई प्रशासनिक कार्रवाई?
लखनऊ अग्निकांड के बाद सरकार ने सख्त रुख अपनाते हुए चार लोगों को गिरफ्तार किया है, जिनमें इमारत के सह-मालिक और अन्य जुड़े लोग शामिल हैं। इसके साथ ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर बिजली विभाग, अग्निशमन विभाग और लखनऊ विकास प्राधिकरण के चार अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मृतकों के परिजनों के लिए आर्थिक सहायता की घोषणा की है। सरकार ने मामले की जांच के लिए विशेष जांच टीम (SIT) गठित की है, जिसे सात दिन में रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए हैं।
जांच में खुल सकते हैं बड़े राज
अब लखनऊ अग्निकांड के पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह सिर्फ एक हादसा था या फिर वर्षों की लापरवाही और अनदेखी का नतीजा? जांच एजेंसियां पुराने दस्तावेजों, अनुमति फाइलों और एलडीए की कार्रवाई की गहन पड़ताल कर रही हैं। प्रारंभिक संकेतों में कई स्तरों पर प्रशासनिक चूक सामने आई है। माना जा रहा है कि SIT की रिपोर्ट के बाद और बड़े खुलासे हो सकते हैं, जिससे जिम्मेदारी तय करने की दिशा साफ होगी। फिलहाल पूरा शहर इस हादसे से सदमे में है और जवाब तलाश रहा है कि आखिर 10 साल पुरानी चेतावनी क्यों नजरअंदाज की गई।
