संपत्ति और भूमि विवादों में ‘आवागमन का अधिकार’ (Right of Way) एक बेहद संवेदनशील विषय है। इस पर कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न फैसलों में नागरिक अधिकारों को सर्वोपरि रखा है। देश की शीर्ष अदालत ने माना है कि किसी भी व्यक्ति को उसकी संपत्ति तक पहुंचने से वंचित करना कानून का सीधा उल्लंघन है।
हाल के फैसलों में अदालतों ने दिया स्पष्ट संदेश
हाल के दिनों में सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्टों ने अपने कई फैसलों में यह बात दोहराई है कि किसी भी व्यक्ति की संपत्ति तक पहुंच बाधित नहीं की जा सकती। अदालतों ने साफ कहा है कि यदि किसी व्यक्ति के पास अपनी जमीन या घर तक जाने का वैकल्पिक रास्ता नहीं है, तो उसे कानूनी संरक्षण देना जरूरी है। इन फैसलों में यह भी कहा गया कि लंबे समय से उपयोग हो रहे रास्तों को बिना ठोस कारण बंद करना अनुचित है और यह सीधे तौर पर नागरिक अधिकारों का उल्लंघन माना जाएगा। अदालतों ने यह भी संकेत दिया है कि ऐसे मामलों में प्रशासन को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए ताकि विवाद बढ़ने से पहले ही समाधान निकाला जा सके।
कानून का ‘भूमि बेकार होने का सिद्धांत’ और ईज़मेंट एक्ट
न्यायालयों ने समय-समय पर यह प्रतिपादित किया है कि यदि किसी भूमि खंड (Plot) के चारों ओर का रास्ता बंद कर दिया जाए, तो वह भूमि आर्थिक और व्यावहारिक रूप से मृत हो जाती है। इसलिए, ‘ईज़मेंट एक्ट’ (Easement Act) के तहत पुश्तैनी या लंबे समय से इस्तेमाल हो रहे रास्ते पर किसी भी प्रकार का नया अवरोध खड़ा नहीं किया जा सकता। अदालतों का मानना है कि भूमि का उपयोग तभी संभव है जब उस तक पहुंच सुगम हो, इसलिए रास्ते के अधिकार को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। हालिया फैसलों में भी इस सिद्धांत को दोहराया गया है और इसे नागरिक अधिकारों की सुरक्षा से जोड़कर देखा गया है।
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