उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार के दूसरे कार्यकाल का दूसरा और संभवतः आखिरी कैबिनेट विस्तार अब सिर्फ मंत्री बदलने की कवायद नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी की बड़ी चुनावी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। इस विस्तार के जरिए पार्टी ने साफ संकेत दिया है कि आने वाले चुनाव में जातीय और क्षेत्रीय समीकरण सबसे अहम भूमिका निभाने वाले हैं। बीजेपी ने ब्राह्मण, जाट, गुर्जर, पासी, वाल्मीकि, लोध और अति पिछड़े वर्गों को प्रतिनिधित्व देकर उन वर्गों को साधने की कोशिश की है, जहां पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी को नुकसान झेलना पड़ा था। खास बात यह रही कि पार्टी ने सिर्फ बड़े वोट बैंक पर नहीं बल्कि छोटे-छोटे सामाजिक समूहों पर भी फोकस बढ़ाया है। राजनीतिक जानकार इसे बीजेपी की “माइक्रो सोशल इंजीनियरिंग” की नई रणनीति बता रहे हैं, जिसके जरिए सत्ता विरोधी माहौल को कमजोर करने की तैयारी की जा रही है।
लंबे इंतजार के बाद हुआ विस्तार, संगठन में भी होंगे बड़े बदलाव
योगी सरकार का यह कैबिनेट विस्तार काफी समय से चर्चा में था। कई बार इसके संकेत मिले, लेकिन किसी न किसी वजह से फैसला टलता रहा। राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा रही कि लखनऊ और दिल्ली के बीच सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा, लेकिन बीजेपी नेताओं ने इन अटकलों को खारिज किया। पार्टी सूत्रों का कहना है कि पांच राज्यों के चुनाव और पश्चिम बंगाल अभियान में पूरी ताकत लगाने के कारण यूपी में कैबिनेट विस्तार को रोका गया था। बताया जा रहा है कि चुनाव खत्म होने के बाद संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर नई रणनीति तैयार की गई। राष्ट्रीय नेतृत्व की तरफ से लगातार बैठकों का दौर चला और आरएसएस के साथ भी कई स्तर पर मंथन हुआ। अब कैबिनेट विस्तार के बाद जल्द ही प्रदेश संगठन में भी बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। माना जा रहा है कि नए प्रदेश अध्यक्ष की टीम का गठन भी जल्द होगा ताकि सरकार और संगठन दोनों को 2027 मिशन के हिसाब से तैयार किया जा सके।
किन चेहरों से किस वोट बैंक को साधने की कोशिश?
इस कैबिनेट विस्तार में शामिल किए गए चेहरों के जरिए बीजेपी ने अलग-अलग समुदायों को सीधा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है। ब्राह्मण समाज में नाराजगी की चर्चाओं के बीच मनोज पांडेय को अहम जिम्मेदारी देकर पार्टी ने साफ किया कि ब्राह्मण नेतृत्व अभी भी बीजेपी की प्राथमिकता में है। पश्चिमी यूपी में जाट वोट बैंक को मजबूत करने के लिए भूपेंद्र चौधरी को प्रमुख चेहरा माना जा रहा है, जबकि गुर्जर समाज को साधने के लिए सोमेंद्र तोमर पर भरोसा जताया गया है। दलित और पासी समाज में पकड़ मजबूत करने के लिए कृष्णा पासवान को आगे बढ़ाया गया, वहीं वाल्मीकि समुदाय को संदेश देने के लिए सुरेंद्र दिलेर को मौका मिला। इसके अलावा लोध और विश्वकर्मा समाज को भी प्रतिनिधित्व देकर बीजेपी ने यह संकेत देने की कोशिश की है कि हर वर्ग की भागीदारी सरकार में सुनिश्चित की जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी अब सिर्फ “गैर-यादव पिछड़ा” राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि हर छोटे सामाजिक समूह को अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है।
विपक्ष की रणनीति का जवाब या 2027 की तैयारी?
2024 लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में बीजेपी को कई सीटों पर अपेक्षा के मुताबिक सफलता नहीं मिली थी। खासकर पश्चिमी यूपी, दलित और अति पिछड़े वर्गों में पार्टी की पकड़ कमजोर होती दिखी थी। समाजवादी पार्टी ने PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण के जरिए कई जातीय समूहों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की थी। वहीं बसपा के कमजोर होने से दलित वोटों का बड़ा हिस्सा दूसरी पार्टियों की तरफ गया। ऐसे में बीजेपी अब उसी सामाजिक समीकरण को नए तरीके से साधने की कोशिश कर रही है। कैबिनेट विस्तार के जरिए पार्टी ने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि सत्ता में सभी वर्गों की भागीदारी है और किसी समुदाय की अनदेखी नहीं होगी। राजनीतिक तौर पर इसे 2027 चुनाव की शुरुआती बिसात माना जा रहा है, जहां बीजेपी पहले से ही हर वर्ग तक पहुंच बनाने में जुट गई है। आने वाले महीनों में संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर ऐसे कई फैसले देखने को मिल सकते हैं, जिनका सीधा असर चुनावी रणनीति पर पड़ेगा।
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