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राजनीति में बड़ा उलटफेर: AAP के बागी सांसदों को राज्यसभा की मान्यता, केजरीवाल को लगा जोरदार झटका

राज्यसभा ने राघव चड्ढा समेत AAP के बागी सांसदों को बीजेपी का सदस्य माना है, जिससे अरविंद केजरीवाल को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। जानिए पूरी घटना की जानकारी।

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आम आदमी पार्टी (AAP) के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका उस समय सामने आया जब राज्यसभा सचिवालय ने पार्टी छोड़ चुके राघव चड्ढा समेत सभी बागी सांसदों को नई मान्यता दे दी। जारी नोटिफिकेशन के अनुसार, इन सभी सांसदों को अब भारतीय जनता पार्टी (BJP) का सदस्य माना जाएगा। इस फैसले के बाद उच्च सदन में बीजेपी की संख्या बढ़कर 113 हो गई है, जिससे संसद के भीतर शक्ति संतुलन में अहम बदलाव देखने को मिला है। यह घटनाक्रम ऐसे समय पर हुआ है जब देश की राजनीति पहले से ही कई मुद्दों को लेकर गर्म है, और अब इस फैसले ने नई बहस को जन्म दे दिया है।

AAP से दूरी बनाने का ऐलान

राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आम आदमी पार्टी से अलग होने की घोषणा की थी। उन्होंने दावा किया था कि उनके साथ कुछ अन्य सांसद भी पार्टी से दूरी बना रहे हैं, जिनमें हरभजन सिंह, स्वाति मालीवाल, विक्रम साहनी और राजिंदर गुप्ता के नाम भी शामिल बताए गए। इन नेताओं ने कहा था कि पार्टी के भीतर हालात बदल रहे हैं और कई मुद्दों पर मतभेद गहराते जा रहे हैं। इस ऐलान के बाद से ही राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई थी और अब राज्यसभा के फैसले ने इस विवाद को और बढ़ा दिया है।

AAP का पलटवार, कार्रवाई की मांग तेज

इस पूरे मामले के बाद आम आदमी पार्टी ने कड़ा रुख अपनाते हुए राज्यसभा के सभापति को पत्र लिखा है। पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय सिंह ने मांग की है कि पार्टी छोड़ने वाले सभी सांसदों को अयोग्य घोषित किया जाए, क्योंकि उन्होंने AAP के टिकट पर चुनाव जीतकर उच्च सदन में जगह बनाई थी। संजय सिंह का कहना है कि यह कदम दल-बदल कानून के दायरे में आता है और इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी साफ किया कि अगर जरूरत पड़ी तो पार्टी इस मुद्दे पर कानूनी लड़ाई लड़ेगी और सभी विकल्प खुले रखेगी।

राजनीति में नई जंग, आगे क्या होगा?

इस पूरे घटनाक्रम ने देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ AAP इसे जनादेश के साथ विश्वासघात बता रही है, वहीं दूसरी तरफ इसे राजनीतिक पुनर्संरचना के तौर पर देखा जा रहा है। राज्यसभा में बीजेपी की बढ़ती ताकत आने वाले समय में कई अहम विधेयकों और फैसलों पर असर डाल सकती है। यह मामला सिर्फ दल-बदल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे आने वाले चुनावों की रणनीति भी जुड़ी हो सकती है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि AAP इस चुनौती से कैसे निपटती है और क्या यह मामला कानूनी मोड़ लेता है या नहीं।

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