17 अप्रैल 2026 का दिन भारतीय संसद के इतिहास में एक बेहद हलचल भरा दिन बनकर सामने आया। इस दिन एक तरफ जहां सरकार द्वारा पेश किया गया संविधान (131वां) संशोधन विधेयक 2026 यानी महिला आरक्षण बिल आवश्यक बहुमत न जुटा पाने के कारण गिर गया, वहीं दूसरी ओर पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादवपप्पू यादव के बयान ने पूरे राजनीतिक माहौल को हिला दिया। महिला आरक्षण पर चर्चा के दौरान उन्होंने जिस तरह के आरोप और टिप्पणियां कीं, उससे सदन में तीखी बहस छिड़ गई। उनके बयान ने न सिर्फ सत्ता पक्ष को कटघरे में खड़ा किया बल्कि पूरे राजनीतिक वर्ग पर सवाल खड़े कर दिए।
पप्पू यादव का नेताओं पर निशाना
बहस के दौरान पप्पू यादव ने बेहद तीखे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि देश में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में नेताओं की भूमिका सबसे अधिक है। उन्होंने यह भी दावा किया कि इंटरनेट पर पोर्न देखने की प्रवृत्ति भी नेताओं में ज्यादा पाई जाती है। उनके इस बयान ने सदन में हंगामे की स्थिति पैदा कर दी। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, “हर डाल पर उल्लू बैठा है, अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा?” इस तरह की टिप्पणी ने विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों को असहज कर दिया। हालांकि उनके आरोपों का कोई आधिकारिक डेटा या पुष्टि सदन में प्रस्तुत नहीं की गई, लेकिन उनके बयान ने बहस का रुख पूरी तरह बदल दिया।
महिला आरक्षण बिल क्यों गिरा?
सरकार की ओर से लाया गया यह विधेयक महिलाओं को लोकसभा और विधानसभाओं में 33% आरक्षण देने का प्रस्ताव रखता था, जिसे 2029 के चुनावों से लागू करने की योजना थी। लेकिन इसे पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत जरूरी था, जो सरकार जुटाने में असफल रही। मतदान के दौरान बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि 230 सांसदों ने इसके खिलाफ वोट किया। इस तरह 54 वोटों के अंतर से यह बिल गिर गया। यह सरकार के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बताया जा रहा था।
जल्दबाजी पर सवाल, आगे क्या होगा?
पप्पू यादव ने सरकार की मंशा पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि बिना किसी विशेषज्ञ समिति या राज्यों से व्यापक परामर्श किए तीन दिन का विशेष सत्र बुलाना समझ से परे है। उन्होंने इसे जल्दबाजी में लिया गया फैसला बताया। इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या सरकार भविष्य में इस बिल को दोबारा पेश करेगी या किसी नए रूप में लाने की कोशिश करेगी। फिलहाल, संसद में हुई इस बहस और बयानबाजी ने यह साफ कर दिया है कि महिला आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर भी राजनीतिक सहमति बनाना आसान नहीं है। आने वाले समय में इस विषय पर और अधिक चर्चा और रणनीति देखने को मिल सकती है।
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