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आप शंकराचार्य कैसे? स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने 8 पेज में दिया जवाब, माघ मेला प्रशासन ने खड़े किए थे सवाल

प्रयागराज माघ मेला विवाद में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने मेला प्रशासन के नोटिस का 8 पन्नों में जवाब दिया।

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प्रयागराज माघ मेला इन दिनों धार्मिक आयोजन से ज्यादा विवाद की वजह से चर्चा में है। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को मेला प्राधिकरण की ओर से भेजे गए एक नोटिस ने बड़ा बवाल खड़ा कर दिया है। इस नोटिस में उनके शंकराचार्य होने और मेला क्षेत्र में जमीन आवंटन को लेकर सवाल उठाए गए थे। इसके जवाब में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अंजनी कुमार मिश्रा ने मेला प्रशासन को आठ पन्नों का विस्तृत जवाब भेजा है। जवाब में साफ कहा गया है कि मेला प्राधिकरण का नोटिस अधिकार क्षेत्र से बाहर है और यह मनमाने तरीके से जारी किया गया है। अधिवक्ता का कहना है कि यह नोटिस न सिर्फ गलत है, बल्कि दुर्भावनापूर्ण और संविधान के खिलाफ भी है। इस जवाब के बाद माघ मेले का यह मामला और ज्यादा गंभीर हो गया है और अब यह सिर्फ जमीन का विवाद नहीं रह गया है।

सड़क पर टेंट, ठंड में विरोध और शंकराचार्य का सवाल

जमीन आवंटन को लेकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का विरोध अभी भी जारी है। मेला क्षेत्र में उन्हें जिस स्थान पर शिविर मिलना चाहिए था, उसे लेकर असहमति के कारण वे अपने कैंप के बाहर सड़क पर टेंट लगाकर बैठे हैं। कड़ाके की ठंड के बावजूद वे वहीं साधना कर रहे हैं। इस दौरान उन्होंने प्रशासन पर कई सवाल खड़े किए हैं। एक बातचीत में उन्होंने कहा कि जो लोग धर्मनिरपेक्षता की शपथ लेते हैं, वही लोग धर्म के काम में बाधा क्यों बन रहे हैं। उनका कहना है कि माघ मेला सिर्फ प्रशासनिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा है। शंकराचार्य के अनुसार, जैसे यज्ञ बिना नारियल की आहुति के अधूरा माना जाता है, वैसे ही शंकराचार्य के स्नान के बिना मेला पूरा नहीं होता। उन्होंने कहा कि ठंड में भूखे-प्यासे रहकर साधना करना उनकी परंपरा का हिस्सा है। साथ ही, उन्होंने उन साधु-संतों को भी जवाब दिया है जो उनके इस विरोध से सहमत नहीं हैं। उनके मुताबिक यह लड़ाई किसी पद या सम्मान की नहीं, बल्कि परंपरा और धार्मिक अधिकारों की रक्षा की है।

8 पन्नों के जवाब में बताया शंकराचार्य बनने का पूरा आधार

मेला प्राधिकरण को भेजे गए आठ पन्नों के जवाब में शंकराचार्य पद को लेकर उठाए गए हर सवाल का विस्तार से जवाब दिया गया है। अधिवक्ता अंजनी कुमार मिश्रा ने बताया है कि ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने अपने जीवनकाल में ही स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। उनके ब्रह्मलीन होने के अगले दिन, 12 सितंबर 2022 को वैदिक विधि-विधान के अनुसार स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का विधिवत अभिषेक किया गया था। जवाब में यह भी कहा गया है कि इस बात का उल्लेख सुप्रीम कोर्ट के 14 अक्टूबर 2022 के आदेश में भी दर्ज है। इसके अलावा, जवाब में साफ किया गया है कि शंकराचार्य पद को लेकर किसी भी अदालत ने कोई रोक नहीं लगाई है। यह भी दावा किया गया है कि श्रृंगेरी, द्वारका और पुरी पीठ के शंकराचार्यों का समर्थन उन्हें प्राप्त है। साथ ही, ब्रह्मलीन स्वरूपानंद सरस्वती की पंजीकृत वसीयत को वैध बताते हुए कहा गया है कि गुजरात हाईकोर्ट पहले ही उस वसीयत को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर चुका है।

आधी रात में नोटिस चिपकाने का आरोप, नीयत पर सवाल

इस पूरे मामले में मेला प्रशासन की कार्रवाई पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। अधिवक्ता की ओर से भेजे गए जवाब में आरोप लगाया गया है कि 19 जनवरी की आधी रात के बाद मेला प्राधिकरण के अधिकारी, कानूनगो और पुलिसकर्मी शंकराचार्य के माघ मेला शिविर के मुख्य द्वार पर नोटिस चिपकाकर चले गए। उस समय शंकराचार्य सो रहे थे और उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका तक नहीं दिया गया। जवाब में इसे गलत नीयत से की गई कार्रवाई बताया गया है। अधिवक्ता का कहना है कि इस नोटिस का मकसद शंकराचार्य की छवि खराब करना और सनातन धर्म को मानने वाले लोगों की भावनाओं को आहत करना है। यह भी कहा गया है कि इस तरह की कार्रवाई संविधान में दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ है। अब यह मामला सिर्फ मेला प्रशासन और शंकराचार्य के बीच का नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल बन गया है कि क्या प्रशासन को धार्मिक परंपराओं में इस तरह दखल देना चाहिए। आने वाले दिनों में इस विवाद पर मेला प्रशासन का अगला कदम क्या होगा, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं।

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