महाकुंभ के दौरान साध्वी के रूप में पहचान बनाने वाली हर्षा रिछारिया एक बार फिर चर्चा में हैं, लेकिन इस बार वजह बेहद संवेदनशील और चौंकाने वाली है। हर्षा ने खुले तौर पर यह स्वीकार किया है कि उन्होंने धर्म की राह छोड़ने का फैसला कर लिया है। उनका कहना है कि पिछले करीब एक साल से उन्हें लगातार मानसिक रूप से परेशान किया गया, उनकी छवि पर सवाल उठाए गए और उनके चरित्र को लेकर सार्वजनिक रूप से टिप्पणियां की गईं। इस लगातार दबाव का असर इतना गहरा पड़ा कि उनके मन में आत्महत्या जैसे विचार भी आने लगे। हर्षा के मुताबिक, यह फैसला किसी गुस्से या जल्दबाजी में नहीं लिया गया, बल्कि यह उनकी मजबूरी बन चुका था। उन्होंने साफ कहा कि जब इंसान की गरिमा, आत्मसम्मान और मानसिक शांति छिनने लगे, तो रास्ता बदलना ही एकमात्र विकल्प रह जाता है।
‘मेरा चरित्र कौन तय करेगा?’ — संत समाज पर सीधे आरोप
बातचीत में हर्षा रिछारिया ने संत-समाज और सामाजिक सोच पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि धर्म की राह पर चलना गलत नहीं था, लेकिन वहां इतना शोर और दखल हो गया कि सांस लेना मुश्किल हो गया। कहीं आध्यात्मिक शोर था तो कहीं आधुनिक सोच को लेकर विरोध। हर्षा का कहना है कि समाज ने यह तय करना शुरू कर दिया कि वह क्या बोलें, कैसे रहें और उनका चरित्र कैसा हो। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि जो लोग मंच से स्त्री को आदिशक्ति बताते हैं, वही लोग जब किसी महिला को आगे बढ़ते देखते हैं तो उसे गलत ठहराने लगते हैं। हर्षा के मुताबिक, उन्हें बार-बार साबित करने को कहा गया कि वह ‘पवित्र’ हैं, जबकि कोई भी पुरुष इस तरह की परीक्षा से नहीं गुजरता। उन्होंने साफ कहा, “मैं कोई सीता नहीं हूं जो हर बार अग्निपरीक्षा दूं।”
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मानसिक यातना, टूटता मनोबल और सुसाइड के ख्याल
हर्षा रिछारिया ने पहली बार इतनी स्पष्टता से अपनी मानसिक स्थिति के बारे में बात की। उन्होंने बताया कि बीते एक साल में उन्हें इतनी गहरी मानसिक पीड़ा से गुजरना पड़ा कि कई बार जीवन खत्म करने जैसे ख्याल आए। सोशल मीडिया ट्रोलिंग, निजी जीवन पर सवाल और सार्वजनिक मंचों पर चरित्र हनन ने उनके मनोबल को तोड़ दिया। हर्षा ने कहा कि हर इंसान की सहने की एक सीमा होती है और जब वह सीमा पार हो जाती है, तो इंसान खुद को बचाने के लिए फैसला करता है। उनके लिए नया रास्ता चुनना मरने से आसान लगा। उन्होंने यह भी कहा कि धर्म छोड़ने का मतलब ईश्वर से दूर जाना नहीं है, बल्कि यह खुद को मानसिक रूप से सुरक्षित रखने का प्रयास है। उनके मुताबिक, आस्था किसी कपड़े या पहचान की मोहताज नहीं होती।
नर्मदा स्नान और ईश्वर पर भरोसा, नए सफर की शुरुआत
धर्म की राह छोड़ने के बाद भी हर्षा रिछारिया की आस्था ईश्वर में बनी हुई है। मकर संक्रांति के अवसर पर नर्मदा नदी में स्नान को उन्होंने भगवान की इच्छा बताया। उनका कहना है कि यह अनुभव उनके लिए बेहद खास और अप्रत्याशित था। हर्षा ने स्पष्ट किया कि वह एंकरिंग और मॉडलिंग के पेशे में वापसी कर रही हैं, क्योंकि यही उनकी असली पहचान रही है। उन्होंने कहा कि लोग उन्हें पहले एंकर और अभिनेत्री के रूप में जानते थे और वही उनकी जड़ों से जुड़ी सच्चाई है। अब वह बिना किसी दबाव के, अपने आत्मसम्मान के साथ आगे बढ़ना चाहती हैं। हर्षा का यह बयान न सिर्फ उनके निजी संघर्ष को उजागर करता है, बल्कि समाज में महिलाओं के प्रति दोहरे मापदंडों पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है।
