मिडिल ईस्ट और खाड़ी क्षेत्र की राजनीति में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE का नाम हमेशा सबसे ऊपर लिया जाता रहा है। दोनों ही सुन्नी मुस्लिम बहुल देश हैं और तेल, व्यापार, सेना और कूटनीति के दम पर पूरे क्षेत्र में उनका दबदबा रहा है। सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद को लंबे समय तक एक-दूसरे का सबसे भरोसेमंद सहयोगी माना गया। ईरान के बढ़ते प्रभाव को रोकना हो, मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे संगठनों का विरोध करना हो या अमेरिका के साथ रणनीतिक रिश्ते निभाने हों, दोनों देश अक्सर एक ही लाइन पर खड़े नजर आते थे। यही वजह थी कि खाड़ी की राजनीति में इन्हें एक मजबूत जोड़ी के तौर पर देखा जाता था।
यमन युद्ध बना रिश्तों में सबसे बड़ी दरार
हालात तब बदलने लगे जब यमन का मुद्दा दोनों देशों के बीच टकराव का कारण बनने लगा। यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी अरब ने सैन्य अभियान शुरू किया था, जिसमें शुरुआत में यूएई भी उसके साथ था। लेकिन वक्त के साथ दोनों देशों की रणनीति अलग-अलग होती चली गई। सऊदी अरब यमन में एक मजबूत केंद्र सरकार चाहता है, जबकि यूएई का फोकस दक्षिण यमन में अपने प्रभाव को बढ़ाने और वहां अलग सत्ता संरचना को समर्थन देने पर रहा है। यही रणनीतिक मतभेद धीरे-धीरे खुलकर सामने आ गए। कई मौकों पर यमन में यूएई समर्थित गुटों और सऊदी समर्थित बलों के बीच तनाव भी देखने को मिला, जिससे साफ हो गया कि दोनों अब एक ही दिशा में नहीं चल रहे।
दबदबे की लड़ाई और आर्थिक प्रतिस्पर्धा
सिर्फ यमन ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय नेतृत्व और आर्थिक प्रभुत्व भी सऊदी अरब और यूएई के रिश्तों में खटास की बड़ी वजह बन रहा है। सऊदी अरब विजन 2030 के जरिए खुद को मिडिल ईस्ट का सबसे बड़ा आर्थिक और निवेश केंद्र बनाना चाहता है। वहीं, दुबई पहले से ही ग्लोबल बिजनेस और फाइनेंशियल हब के रूप में स्थापित है। सऊदी की नई नीतियों से कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियों पर दबाव बढ़ा कि वे अपना क्षेत्रीय मुख्यालय सऊदी अरब में शिफ्ट करें। इससे यूएई को सीधी चुनौती महसूस हुई। इसके अलावा OPEC में तेल उत्पादन को लेकर भी दोनों देशों के बीच मतभेद सामने आए, जहां यूएई ने सऊदी की लाइन से अलग रुख अपनाया। यह सब संकेत दे रहे हैं कि अब यह दोस्ती प्रतिस्पर्धा में बदल चुकी है।
दोस्ती से दुश्मनी तक, आगे क्या होंगे असर
सऊदी अरब और यूएई के बीच बढ़ती दूरी का असर सिर्फ इन दोनों देशों तक सीमित नहीं रहने वाला है। इसका सीधा प्रभाव पूरे मिडिल ईस्ट की राजनीति, यमन संकट और खाड़ी देशों के आपसी संतुलन पर पड़ेगा। अमेरिका और पश्चिमी देशों के लिए भी यह स्थिति नई चुनौती बनकर उभरी है, क्योंकि अब तक वे इन दोनों को एक ब्लॉक की तरह देखते थे। जानकारों का मानना है कि दोनों देश खुले तौर पर दुश्मनी का ऐलान भले न करें, लेकिन पर्दे के पीछे यह टकराव और गहरा हो सकता है। कभी जो जोड़ी मिडिल ईस्ट की राजनीति की दिशा तय करती थी, आज वही जोड़ी एक-दूसरे के रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट बनती नजर आ रही है। यही वजह है कि सऊदी और यूएई के बिगड़ते रिश्ते पूरी दुनिया की नजरों में हैं।
