अरावली पहाड़ियों को लेकर लंबे समय से चल रहे कानूनी और वैज्ञानिक विवाद पर अब सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। सोमवार को हुई सुनवाई में शीर्ष अदालत ने अपने ही पहले दिए गए आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी। इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच कर रही है, जिसमें जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह भी शामिल हैं। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि अरावली हिल्स और अरावली रेंज की परिभाषा को लेकर जो भ्रम बना हुआ है, उसे दूर किए बिना आगे बढ़ना ठीक नहीं होगा। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार और संबंधित राज्यों को नोटिस जारी किया है। अदालत का मानना है कि पर्यावरण से जुड़े इस संवेदनशील मुद्दे पर किसी भी तरह की जल्दबाजी भविष्य में गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है, इसलिए पहले तथ्यों और वैज्ञानिक आधार को पूरी तरह स्पष्ट करना जरूरी है।
100 मीटर ऊंचाई के मानदंड पर सवाल, वैज्ञानिक जांच की जरूरत?
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने एक अहम सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि यह तय किया जाना जरूरी है कि कुल 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 पहाड़ियों का 100 मीटर ऊंचाई के मानदंड पर खरा उतरना क्या वास्तव में तथ्यात्मक और वैज्ञानिक रूप से सही है। कोर्ट ने संकेत दिया कि सिर्फ कागजी आंकड़ों के आधार पर किसी क्षेत्र को अरावली से बाहर या भीतर मान लेना सही नहीं हो सकता। इसके लिए भूवैज्ञानिक और वैज्ञानिक जांच की आवश्यकता पड़ सकती है। अदालत ने यह भी पूछा कि क्या इस तरह के मानदंड तय करने से अरावली पर्वत श्रृंखला की वास्तविक भौगोलिक संरचना और उसकी पारिस्थितिकी को सही तरीके से समझा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट का साफ कहना था कि अगर परिभाषा ही स्पष्ट नहीं होगी, तो संरक्षण और खनन जैसे बड़े फैसले भी विवादों में फंसे रहेंगे।
खनन और 500 मीटर गैप पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
अरावली क्षेत्र में खनन को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि यह विचार किया जाना चाहिए कि क्या अरावली पहाड़ियों के बीच 500 मीटर के अंतराल यानी गैप्स में नियंत्रित खनन की अनुमति दी जा सकती है या नहीं। यदि किसी स्थिति में खनन की इजाजत दी जाती है, तो यह भी तय होना चाहिए कि कौन-से सटीक और कड़े संरचनात्मक मानक अपनाए जाएंगे, ताकि पारिस्थितिक निरंतरता प्रभावित न हो। अदालत ने साफ किया कि अरावली केवल पहाड़ियों का समूह नहीं है, बल्कि यह एक पूरी पारिस्थितिक प्रणाली है, जो उत्तर भारत के पर्यावरण संतुलन में अहम भूमिका निभाती है। ऐसे में छोटे-छोटे फैसले भी बड़े पर्यावरणीय खतरे पैदा कर सकते हैं। इसी वजह से कोर्ट ने तब तक सभी तरह की नई खनन गतिविधियों पर रोक बनाए रखने का संकेत दिया है, जब तक स्थिति पूरी तरह स्पष्ट न हो जाए।
विशेषज्ञ समिति का प्रस्ताव, 21 जनवरी को अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले की गहराई से जांच के लिए एक उच्च-स्तरीय विशेषज्ञ समिति के गठन का प्रस्ताव भी रखा है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि इस समिति का काम केवल रिपोर्ट देना नहीं होगा, बल्कि यह भी देखना होगा कि अरावली क्षेत्र से बाहर रखे जाने वाले भूभागों की पहचान कैसे की गई है और क्या इस तरह का बहिष्करण पर्यावरणीय क्षरण के जोखिम को बढ़ाता है। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि समिति के गठन से पहले यह तय करना जरूरी है कि वह किन-किन क्षेत्रों की जांच करेगी। इस पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समिति की सिफारिशों और अदालत के निर्देशों को फिलहाल स्थगित रखा जाएगा और यह स्थगन समिति के गठन तक प्रभावी रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 21 जनवरी की तारीख तय करते हुए सभी पक्षों को नोटिस जारी किया है। साथ ही राज्यों को यह निर्देश भी दिया गया है कि अगली सुनवाई तक किसी भी प्रकार की नई खनन गतिविधि न की जाए।
