आगरा। कहते हैं कि पूत कपूत पालने में ही पहचान लिए जाते हैं, लेकिन आगरा के वीर सपूत अजयराज ने जो कर दिखाया, वह वीरता और पितृ-भक्ति की एक ऐसी मिसाल है जो सदियों तक याद रखी जाएगी। एक तरफ जहाँ आज के दौर में रिश्तों की डोर कमजोर होती जा रही है, वहीं अजयराज ने भूखे मगरमच्छ के सामने अपनी जान की बाजी लगाकर अपने पिता को नया जीवन दान दिया। इस अदम्य साहस की गूंज अब देश के सर्वोच्च सदन यानी राष्ट्रपति भवन तक पहुँच गई है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने खुद इस ‘जांबाज’ को दिल्ली बुलाकर सम्मानित किया है, जिससे आगरा ही नहीं बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश का सीना गर्व से चौड़ा हो गया है।
खौफनाक मंजर: जब साये की तरह आई मौत और भिड़ गया बेटा
यह घटना किसी फिल्म की कहानी जैसी लगती है, लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा डरावनी थी। अजयराज के पिता नदी किनारे अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त थे, तभी अचानक पानी में छिपे एक विशालकाय मगरमच्छ ने उन पर हमला कर दिया। पलक झपकते ही मगरमच्छ ने पिता का पैर अपने मजबूत जबड़ों में जकड़ लिया और उन्हें गहरे पानी की ओर खींचने लगा। चीख-पुकार सुनकर अजयराज मौके पर पहुँचे। उन्होंने देखा कि मौत उनके पिता को निगलने के लिए तैयार है। बिना एक पल सोचे, अजयराज पानी में कूद गए। उन्होंने न लाठी देखी न डंडा, बस अपने नंगे हाथों से मगरमच्छ की आँखों और नाक पर प्रहार करना शुरू कर दिया। यह एक ऐसा युद्ध था जहाँ एक तरफ खूंखार शिकारी था और दूसरी तरफ एक बेटे का अटूट प्यार। अंततः बेटे के साहस के आगे मगरमच्छ को हार माननी पड़ी और वह शिकार छोड़कर भाग गया।
मुर्मू ने थपथपाई अजयराज की पीठ
अजयराज की इस वीरता की खबर जब सोशल मीडिया और समाचार पत्रों के माध्यम से फैली, तो शासन-प्रशासन भी दंग रह गया। इस वीरता का संज्ञान लेते हुए राष्ट्रपति कार्यालय से बुलावा आया। हाल ही में राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक विशेष सम्मान समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अजयराज को सम्मानित किया। राष्ट्रपति ने उनसे इस घटना के बारे में विस्तार से बात की और कहा कि “देश को ऐसे ही साहसी युवाओं की जरूरत है जो संकट के समय अपनों और समाज के लिए ढाल बनकर खड़े हों।” अजयराज के लिए वह पल भावुक कर देने वाला था जब देश की प्रथम नागरिक ने उनकी पीठ थपथपाई।
एक साधारण युवा से ‘रियल लाइफ हीरो’ बनने तक का सफर
अजयराज एक साधारण परिवार से आते हैं, लेकिन उनके संस्कार और साहस असाधारण हैं। सम्मान पाकर लौटे अजयराज का उनके गाँव और शहर में जोरदार स्वागत किया गया। लोग उन्हें ‘आज का श्रवण कुमार’ कह रहे हैं। अजयराज का कहना है कि उन्होंने उस वक्त कुछ नहीं सोचा था, बस उनके सामने उनके पिता का चेहरा था। इस सम्मान के बाद अजयराज अब युवाओं के लिए एक प्रेरणा बन गए हैं। स्थानीय प्रशासन ने भी उनकी शिक्षा और भविष्य के लिए मदद का आश्वासन दिया है। यह कहानी हमें सिखाती है कि यदि इरादे मजबूत हों और दिल में अपनों के लिए सच्चा प्रेम हो, तो इंसान मौत को भी मात दे सकता है।
