Sunday, February 1, 2026
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‘अत्याचारी प्यार दिखाए तो अलर्ट हो जाओ…’, सुहेल सेठ ने ट्रंप की तारीफ तो ये क्या बोल गए जावेद अख्तर

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सोशल मीडिया पर रविवार का दिन कुछ अलग ही गर्मजोशी से भरा रहा। एक्स प्लेटफॉर्म पर विचारों की अदला-बदली ने एक हल्की-सी बहस को उस दिशा में मोड़ दिया, जहां साहित्य और राजनीति का संगम नजर आने लगा। मामला शुरू हुआ चर्चित विचारक सुहेल सेठ की उस टिप्पणी से, जिसमें उन्होंने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया प्रतिक्रिया की तारीफ कर दी। ट्रंप ने न्यूयॉर्क के विधायक ज़ोहरान ममदानी के बारे में सकारात्मक टिप्पणी की थी, जो आमतौर पर उनके बयानों में कम ही देखने को मिलता है। सुहेल सेठ ने इसे “तथ्य आधारित” और “परिपक्व राजनीतिक व्यवहार” का उदाहरण बताया। सोशल मीडिया पर यह टिप्पणी पहले तो सामान्य राजनीतिक प्रतिक्रिया जैसी लगी, लेकिन अचानक यह मामला मोड़ लिया जब जावेद अख्तर ने बेहद शालीन, लेकिन तीखी बात कहते हुए एक पुरानी साहित्यिक सीख का हवाला दिया, “सावधान हो जाना चाहिए, जब अत्याचारी प्यार दिखाने लगे।” इस एक लाइन ने पूरी बहस को नए आयाम दे दिए, क्योंकि इसके अर्थ सिर्फ़ सतह पर नहीं, गहराई में उतरकर दिखते हैं।

जावेद अख्तर का शेर—कम शब्द, गहरा वार

जावेद अख्तर की यह टिप्पणी सिर्फ़ एक जवाब नहीं थी, बल्कि एक अनुभवजन्य चेतावनी थी। उन्होंने शेक्सपियर की एक पंक्ति की शैली में रखी गई उस सीख का हिंदी रूपांतर साझा किया, जो बताती है कि किसी कठोर या विवादित शख्स की अचानक दिखाई गई नरमी को तुरंत ‘गुणगान’ में बदल देना बुद्धिमानी नहीं है। अख्तर के इस एक वाक्य ने सोशल मीडिया पर एक गहरा संकेत छोड़ा—कि नेता चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसकी पुरानी छवि और निर्णयों को भूला नहीं जा सकता। उनके मुताबिक, सत्ता के गलियारों में किसी भी ‘अत्याचारी’ की अचानक की गई अच्छाई कई बार किसी बड़े मकसद या रणनीति की तरफ इशारा कर सकती है। यही कारण है कि अख्तर के समर्थकों ने इस टिप्पणी को सिर्फ़ राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक चेतावनी के रूप में देखा।

बहुत से यूज़र्स ने लिखा कि जावेद अख्तर ने “कम शब्दों में बड़ी बात” कह दी। कई लोगों ने इस पंक्ति को संदर्भ के बाहर अलग-अलग तरह से भी समझा किसी ने इसे अंतरराष्ट्रीय राजनीति का संकेत माना, तो किसी ने इसे सिद्धांत के स्तर पर समझने की कोशिश की। दूसरी ओर, सुहेल सेठ के समर्थकों ने कहा कि “जिसने अच्छा काम किया है, उसकी तारीफ करने में बुराई कहां?” दोनों पक्षों के तर्कों के बीच अख्तर का शेर एक साहित्यिक मोड़ की तरह खड़ा दिखाई दिया, जिसने चर्चा को मनोरंजक तो बनाया ही, साथ ही उसकी गंभीरता भी बढ़ा दी।

सुहेल सेठ-ट्रंप बहस में जनता की दिलचस्पी

इस पूरे विवाद ने एक दिलचस्प बात सामने रखी सोशल मीडिया सिर्फ़ नेताओं की बातों का नहीं, बल्कि चिंतकों, लेखकों और कलाकारों के विचारों का भी अखाड़ा बन चुका है। जावेद अख्तर और सुहेल सेठ जैसे दो प्रभावशाली लोगों की हल्की-फुल्की नोकझोंक भी तुरंत चर्चाओं में छा जाती है। यूज़र्स के रिएक्शन इस बार भी उसी पैटर्न पर चले। एक तरफ लोग अख्तर के साहित्यिक अंदाज़ के मुरीद नजर आए, तो दूसरी ओर सेठ की “तथ्य आधारित राजनीति” की पैरवी करने वाले भी कम नहीं थे।

बहस इतनी दिलचस्प इसलिए भी रही क्योंकि इसने एक बड़े सवाल को उभारा क्या किसी विवादित नेता की एक सकारात्मक टिप्पणी से उसके पूरे राजनीतिक इतिहास को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है? कुछ लोगों ने कहा कि ट्रंप की तारीफ करना उनके पुराने बयानों के इतिहास के विपरीत है, जबकि कई यूज़र्स ने पूर्णतः व्यावहारिक दृष्टिकोण रखते हुए कहा कि “अच्छा काम हमेशा अच्छा ही कहा जाना चाहिए, चाहे वह कोई भी करे।” सोशल मीडिया की यही विविधता इस बहस को और भी दिलचस्प बनाती है। अख्तर के शेर पर बन रहे मीम्स, छोटे वीडियो और हास्य टिप्पणियों ने भी चर्चा में मसाला भर दिया।

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