बिहार की राजनीति में शनिवार का दिन बेहद दिलचस्प रहा, जब नई गठित एनडीए सरकार के मंत्रियों ने अपने-अपने विभाग का कार्यभार संभालना शुरू किया। इसी बीच सबसे ज्यादा सुर्खियाँ बटोरने वाला फैसला रहा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का, जिन्होंने गृह विभाग की जिम्मेदारी बीजेपी के वरिष्ठ नेता और डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी को सौंप दी। यह फैसला जहां शासन के भीतर नई ऊर्जा का संकेत माना गया, वहीं विपक्ष ने इसे सत्ता के समीकरण बदलने वाला फैसला बताकर सवाल खड़े कर दिए।
जेडीयू में नाराज़गी नहीं, बल्कि ‘स्ट्रेटेजी’ की चर्चा
गृह विभाग को लेकर उठे सवालों के बीच जेडीयू के वरिष्ठ नेता और नीतीश कुमार के करीबी अशोक चौधरी ने माहौल को और रोचक बना दिया। उन्होंने कहा कि यदि मुख्यमंत्री ने गृह जैसा अहम विभाग सम्राट चौधरी को दिया है, तो इसका मतलब है कि वे लॉ एंड ऑर्डर को मजबूती से संभालेंगे। उनके इस बयान ने संकेत दिया कि पार्टी के भीतर इस फैसले से कोई असहजता नहीं है, बल्कि इसे मुख्यमंत्री की सोची-समझी रणनीति माना जा रहा है।
विपक्ष का हमला, सरकार का पलटवार
जहां सरकार इस बदलाव को सकारात्मक कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे सत्ता का संतुलन बिगाड़ने वाला निर्णय बता रहा है। विपक्ष का आरोप है कि गृह जैसा शक्तिशाली विभाग सौंपने के पीछे राजनीतिक दबाव और केंद्र की भूमिका की छाप है। हालांकि, एनडीए के मंत्री इस आलोचना को ‘बिन आधार’ बताते हुए कहते हैं कि बिहार में कानून व्यवस्था को सुधारने के लिए यह बदलाव जरूरी था और सम्राट चौधरी इस काम को बखूबी अंजाम देंगे।
नीतीश का ‘मास्टर प्लान’ या नए समीकरण की शुरुआत?
सम्राट चौधरी के गृह विभाग संभालने को लेकर कई राजनीतिक पंडित इसे नीतीश कुमार की नई राजनीतिक चाल मान रहे हैं। उनका कहना है कि इससे प्रशासनिक फैसला लेने में नए आयाम जुड़ेंगे और सत्ता में बीजेपी की भूमिका और मजबूत दिखाई देगी। दूसरी ओर, कुछ इसे 2025 के बाद के राजनीतिक ‘समीकरण सेट’ करने की कोशिश भी मान रहे हैं। जो भी हो, इस फैसले ने बिहार की राजनीति में रोमांच, सस्पेंस और नए सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनके जवाब आने वाले समय में राजनीति की दिशा तय करेंगे।
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