Sunday, February 1, 2026
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शहीद बेटे को ना लगे ठंड, मां ने पत्थर की प्रतिमा पर लपेटा कम्बल, वीडियो देख निकल आएंगे आंसू

जम्मू के अर्निया में शहीद गुरनाम सिंह की प्रतिमा के पास उनकी मां जसवंत कौर हर सर्दी में कंबल लपेटती हैं। यह कहानी मातृत्व, बलिदान और अधूरे अरमान की प्रेरक दास्तान है।

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अर्निया, जम्मू के एक चौक पर ठंडी हवाओं और बर्फीली ठिठुरन के बीच खड़ी जसवंत कौर की तस्वीर हर किसी का दिल छू जाती है। उनके बेटे शहीद कांस्टेबल गुरनाम सिंह की प्रतिमा के पास खड़ी यह मां हर सर्दी में उसी लाडले बेटे की याद में कंबल लपेटती हैं। साल 2021 में जब प्रतिमा लगाई गई थी, तो यह दुनिया के लिए गर्व का प्रतीक बनी, लेकिन जसवंत कौर के लिए वह आज भी उनका वही बच्चा है जो ठंड में ठिठुर सकता है। उनके चेहरे पर संतोष और आंखों में आंसू दोनों एक साथ दिखते हैं। हर साल जब जम्मू में ठंड की पहली लहर आती है, तो जसवंत कौर ऊनी कंबल लेकर प्रतिमा पर उसे लपेटती हैं, मानो अपने बेटे को सर्दी से बचा रही हों।

वो अधूरा अरमान और पहला इश्क

मां के दिल में बेटे की यादें हमेशा ताजा रहती हैं। जब 26 साल के गुरनाम ने आखिरी बार घर का दरवाजा खोला था, उन्होंने अपनी शादी और जीवन के नए अध्याय की योजना बनाई थी। जसवंत कौर ने सोचा था कि अगली बार बेटे की छुट्टी पर घर में शहनाइयां बजेंगी और खुशियों का माहौल होगा। लेकिन गुरनाम के दिल में उसका पहला इश्क उसके देश और वर्दी के प्रति था। मातृ-ममता और देशभक्ति का यह अद्भुत संगम हमें याद दिलाता है कि शहीद केवल सीमा पर ही नहीं, बल्कि अपने परिवार और देश में भी हमेशा जीवित रहते हैं।

पाकिस्तान की नापाक हरकत को रोकते हुए दी शहादत

21 अक्टूबर 2016 को हीरानगर सेक्टर में घुसपैठ करते आतंकियों के खिलाफ गुरनाम ने अद्भुत साहस दिखाया। एक आतंकवादी को ढेर कर सीजफायर का मुंहतोड़ जवाब दिया। इसके अगले दिन, 22 अक्टूबर 2016 को गोलियों से छलनी होने के बावजूद पीछे हटे बिना उन्होंने अपनी जान देश के लिए न्यौछावर कर दी। उनकी बहादुरी और शहादत ने केवल सीमाओं पर ही नहीं बल्कि पूरे परिवार में वीरता और गौरव की भावना भर दी। आज भी उनके बलिदान की गूंज हर सीमा पर सुनाई देती है और मातृ-ममता की मिसाल उनके परिवार में जीवित है।

शहादत के बाद भी जारी है रिश्ता

BSF की 173वीं बटालियन का यह वीर जवान आज भी अपनी मां की गोद में सुरक्षित है। जसवंत कौर का यह त्याग और प्रेम हमें याद दिलाता है कि एक जवान का बलिदान सिर्फ सीमा तक सीमित नहीं होता। उनका परिवार हर दिन नई शहादत जीता है। कंबल, जो वह अपने बेटे की प्रतिमा पर लपेटती हैं, सिर्फ ऊन का टुकड़ा नहीं है, बल्कि ममता की गर्माहट है, जिसे कोई दुश्मन या कठिन परिस्थितियां कभी खत्म नहीं कर सकती। यह कहानी मातृत्व, देशभक्ति और अधूरा अरमान की प्रेरक दास्तान है, जो हर दिल को भावुक कर देती है।

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