बेंगलुरु के पास स्थित अवलाहल्ली जंगल में हुई एक घटना ने न सिर्फ सोशल मीडिया बल्कि समाज की सोच पर भी गहरा सवाल खड़ा कर दिया है। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर रितिका सूर्यवंशी रोज की तरह सुबह रनिंग के लिए निकली थीं। करीब 5 किलोमीटर की रनिंग पूरी करने के बाद जब वह लौट रही थीं, तभी रास्ते में मौजूद तीन बच्चों ने उनके शरीर को लेकर भद्दी और आपत्तिजनक टिप्पणियां करनी शुरू कर दीं। रितिका के मुताबिक इन बच्चों की उम्र लगभग 10 से 13 साल के बीच थी। शुरुआत में उन्होंने इसे नजरअंदाज किया, लेकिन जब कमेंट्स बढ़ते गए और हद पार होने लगी, तो उन्होंने खुद रुककर बच्चों से सवाल किया। यह कोई अंधेरी गली या सुनसान सड़क नहीं थी, बल्कि एक सार्वजनिक जगह थी, जहां लोग रोज घूमने और व्यायाम करने आते हैं। इस घटना ने यह दिखा दिया कि असहजता और असुरक्षा अब सिर्फ बड़े शहरों की रातों तक सीमित नहीं रही, बल्कि दिन के उजाले में, बच्चों के व्यवहार के रूप में सामने आ रही है।
रितिका की आपबीती: बच्चों के शब्दों में झलकी खतरनाक सोच
रितिका सूर्यवंशी ने इंस्टाग्राम पर वीडियो शेयर करते हुए पूरी घटना को विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि बच्चों के शब्द सिर्फ मजाक नहीं थे, बल्कि उनमें वही मानसिकता झलक रही थी, जो अक्सर बड़े लोगों से जोड़ी जाती है। रितिका के अनुसार, यह पहली बार नहीं था जब उन्होंने ऐसी बातें सुनी हों, लेकिन बच्चों के मुंह से यह सब सुनना ज्यादा डराने वाला था। उन्होंने वीडियो में साफ कहा कि यह व्यवहार अचानक पैदा नहीं होता, बल्कि घर और समाज से सीखा जाता है। रितिका ने सवाल उठाया कि जब छोटी उम्र में ही बच्चों को यह नहीं सिखाया जाता कि किसी महिला से कैसे बात करनी चाहिए, उसकी सीमाओं का सम्मान कैसे करना चाहिए, तो आगे चलकर हालात और भी बिगड़ सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अक्सर समाज लड़कियों को कपड़े पहनने, चलने और बोलने के नियम सिखाता है, लेकिन लड़कों को यह नहीं सिखाया जाता कि सामने वाला इंसान भी सम्मान का हकदार है। यही सोच धीरे-धीरे ऐसे व्यवहार को जन्म देती है।
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चेहरा उजागर न करने का फैसला
जब यह वीडियो वायरल हुआ, तो सोशल मीडिया पर कई लोगों ने उन बच्चों के चेहरे दिखाने और उन्हें सार्वजनिक रूप से बेनकाब करने की मांग की। लेकिन रितिका ने इस पर बेहद संतुलित और समझदारी भरा रुख अपनाया। उन्होंने साफ कहा कि वे बच्चे अभी किशोर भी नहीं हुए हैं और उनके सामने पूरी जिंदगी पड़ी है। अगर उनका चेहरा सोशल मीडिया पर उजागर किया जाता, तो यह उनके लिए जीवन भर का मानसिक बोझ बन सकता था। रितिका ने लिखा कि गलती को सुधारने का मौका देना ज्यादा जरूरी है, न कि किसी बच्चे को हमेशा के लिए अपराधी बना देना। उनका यह फैसला कई लोगों के लिए चौंकाने वाला था, क्योंकि अक्सर गुस्से में लोग बदले की भावना से कदम उठाते हैं। रितिका का कहना था कि असली लड़ाई बच्चों से नहीं, बल्कि उस सोच से है, जो उन्हें यह सब सिखा रही है। यह घटना सजा से ज्यादा सुधार और संवाद की जरूरत को रेखांकित करती है।
परवरिश और संस्कार पर उठे तीखे सवाल
इस वीडियो के वायरल होते ही सोशल मीडिया पर तीखी बहस छिड़ गई। एक यूजर ने लिखा कि समाज जितना जोर लड़कियों को सभ्य और सीमित बनाने पर देता है, काश उतना ही जोर लड़कों को संस्कार देने पर भी देता। दूसरे यूजर ने बताया कि उसने भी बेंगलुरु में इसी तरह का अनुभव किया था और हैरानी की बात यह थी कि वहां भी बदसलूकी करने वाले बच्चे ही थे। कई लोगों ने इसे देश और समाज की सामूहिक विफलता बताया। इस घटना ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम सच में सुरक्षित और संवेदनशील समाज बना पा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों की सोच को सही दिशा देने की जिम्मेदारी सिर्फ स्कूलों की नहीं, बल्कि परिवार और आसपास के माहौल की भी है। रितिका की कहानी सिर्फ एक महिला की आपबीती नहीं, बल्कि उस आईने की तरह है, जिसमें समाज को अपनी असल तस्वीर देखनी चाहिए।
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