महाराष्ट्र की राजनीति हमेशा से अपने अप्रत्याशित मोड़ों के लिए मशहूर रही है, लेकिन इस बार जो तूफान उठा है, वह पहले से कहीं ज्यादा रहस्यमय माना जा रहा है। उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के अचानक दिल्ली रवाना होने और अमित शाह से चुपचाप मुलाकात करने ने पहले ही चर्चाओं की फसल उगा दी थी। अब शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने इस दौरे को लेकर ऐसा तीखा और असामान्य तंज कसा कि पूरा राजनीतिक माहौल रोमांच से भर गया। उद्धव का कहना कि “कोई एक बाबा मुझे मार दिया कहते हुए दिल्ली जा बैठा” ने इस दौरे की दिशा, मंशा और राजनीति के भीतर चल रही हलचल पर एक नया सस्पेंस खड़ा कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषक इस बयान को सिर्फ मजाक या तंज नहीं, बल्कि गहरे संकेत के रूप में देख रहे हैं। जो आने वाले दिनों में बड़ा सियासी विस्फोट साबित हो सकता है।
उद्धव ठाकरे के शब्दों ने बढ़ाया तनाव
उद्धव ठाकरे ने मंच से दिए इस भाषण में सिर्फ शिंदे के दौरे पर सवाल नहीं उठाए, बल्कि पूरे गठबंधन ढांचे की हालत का एक अलग ही चित्र पेश किया। उन्होंने कहा कि सत्ता में बैठे कुछ नेता इतने असहाय दिखाई दे रहे हैं जैसे उन्हें निर्णय लेने की स्वतंत्रता ही नहीं मिली। उद्धव के अनुसार “राजनीति कंकड़ और चावल की तरह है, गलत को हटाना और सही को चुनना जरूरी है, लेकिन इसके लिए सही मार्गदर्शक की जरूरत होती है।” इस बयान को महायुती में बढ़ती दरारों से जोड़कर देखा जा रहा है। बीते कई महीनों में कई बार यह चर्चा बाहर आ चुकी है कि सरकार के भीतर कुछ फैसलों को लेकर टकराव बढ़ रहा है। उद्धव ने महापालिका प्रशासन का मसला भी उठाया और कहा कि “मुंबई की व्यवस्था पिछले कुछ सालों में इतनी उलझ चुकी है कि यह पता ही नहीं चलता कि फैसले कौन लेता है।”
उन्होंने दावा किया कि आदित्य ठाकरे के प्रयासों से महापालिका स्कूलों में बच्चों के एडमिशन में ऐसी मांग देखने को मिली, जो कई वर्षों से गायब थी। लेकिन मौजूदा दौर में परिस्थितियाँ बिल्कुल उलटी दिखाई दे रही हैं, जहाँ न तो योजनाएँ जमीन पर टिक पा रही हैं और न ही शहर के प्रशासनिक ढांचे में पारदर्शिता दिख रही है। उद्धव ने सरकार पर आरोप लगाया कि कई घोषणाएँ सिर्फ कागजों में सीमित रह गई हैं, जबकि जनता रोजमर्रा की समस्याओं से जूझती रही है।
बाबा’ वाले बयान का मतलब क्या?
उद्धव ठाकरे के “बाबा मुझे मार दिया” वाले बयान ने राजनीतिक चर्चाओं को एकदम नई दिशा दे दी। यह वाक्य न सिर्फ रहस्यमयी है बल्कि इसे ऐसे समय कहा गया जब शिंदे के दिल्ली दौरे को लेकर पहले से ही कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। क्या शिंदे किसी दबाव में हैं? क्या वह दिल्ली से कोई नया संकेत लेने गए थे? क्या गठबंधन की राजनीति किसी बड़े फेरबदल की ओर बढ़ रही है? इन सवालों ने राजनीतिक हलकों में गर्मी बढ़ा दी है।
सूत्रों के मुताबिक कई मुद्दों पर शिंदे कैंप और महायुती के अन्य हिस्सों के बीच मतभेद समय-समय पर उभरते रहे हैं। कुछ नेताओं का कहना है कि दिल्ली दौरे का मकसद शक्ति-संतुलन को मजबूत करना हो सकता है। हालांकि आधिकारिक बयान काफी साधारण रखे गए, लेकिन उद्धव का रहस्यमय तंज इस मुलाकात के महत्व को बहुत बढ़ा देता है। शिक्षा योजनाओं को लेकर भी उद्धव ने सरकार को घेरा और पूछा कि “लड़कियों की पढ़ाई मुफ्त कहने से क्या होगा, जब घरों में फीस के पैसे ही नहीं हैं?” उन्होंने कहा कि डिजिटल क्लासरूम और स्टूडियो से पढ़ाई जैसी सुविधाएँ तभी काम आएँगी जब सरकार वास्तव में इन्हें लागू करने का साहस दिखाएगी। उनके अनुसार केवल योजना बनाना और उसे प्रचारित कर देना समाधान नहीं, बल्कि असली काम तो उसके क्रियान्वयन में है। जहाँ सरकार कमजोर साबित हो रही है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि शिंदे के दिल्ली दौरे के ठीक बाद राजनीतिक गलियारों में नए समीकरणों की बातें शुरू हो चुकी हैं। कई नेता मानते हैं कि यदि उद्धव इस तरह के बयान दे रहे हैं, तो वह किसी बड़े राजनीतिक संकेत को भांप रहे होंगे। महाराष्ट्र की राजनीति में पहले भी अचानक होने वाले घटनाक्रमों ने बड़ा राजनीतिक भूचाल पैदा किया है—और इस बार भी वैसा ही माहौल बनता दिख रहा है।
अभी तक शिंदे या उनके शिविर से उद्धव के बयान पर किसी तरह की तीखी प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन राजनीतिक तापमान तेजी से बढ़ रहा है। दिल्ली दौरा, उद्धव का तंज, गठबंधन की अंदरूनी हलचल—इन सबने यह संकेत दे दिया है कि महाराष्ट्र आने वाले दिनों में एक और बड़े राजनीतिक मोड़ का साक्षी बन सकता है।
