Bihar Politics: बिहार की राजनीति में इस वक्त हर पल समीकरण बदल रहे हैं। एक तरफ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्यसभा की सदस्यता लेने के लिए दिल्ली रवाना हो चुके हैं, वहीं दूसरी तरफ पटना में ‘गद्दी’ की जंग सड़क पर आ गई है। गुरुवार की सुबह बीजेपी प्रदेश कार्यालय के बाहर उस वक्त हड़कंप मच गया जब उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के समर्थन में लगे पोस्टरों को फाड़ दिया गया। दिलचस्प बात यह है कि ये पोस्टर किसी विपक्षी दल ने नहीं, बल्कि बीजेपी कार्यालय के पास मौजूद कुछ कार्यकर्ताओं ने ही हटाए और फाड़े। जब मीडिया की टीम वहां पहुंची, तो पोस्टर फाड़ने वालों ने दलील दी कि यह कार्यालय का गेट है और यहां निजी पोस्टर नहीं लगाए जा सकते। लेकिन राजनीति के जानकारों का मानना है कि यह महज अनुशासन का मामला नहीं, बल्कि सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री पद की रेस से बाहर करने की एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा है।
आखिर पोस्टर में ऐसा क्या था?
यह विवाद तब शुरू हुआ जब वाल्मीकि समाज संघ के अध्यक्ष राजेश कुमार की ओर से एक बड़ा पोस्टर लगाया गया। इस पोस्टर पर साफ शब्दों में लिखा था— “वाल्मीकि समाज संघ की यही पुकार, बिहार में हो सम्राट की सरकार।” इसके साथ ही पोस्टर के जरिए ठेकेदारी प्रथा को समाप्त करने की मांग भी की गई थी। पोस्टर के जरिए एक बड़ा संदेश देने की कोशिश की गई थी कि बीजेपी के भीतर सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए एक बड़ा वर्ग लामबंद हो रहा है। हालांकि, पोस्टर लगने के कुछ ही घंटों के भीतर इसे फाड़ दिया जाना यह संकेत देता है कि पार्टी के भीतर एक धड़ा ऐसा भी है, जिसे सम्राट चौधरी का बढ़ता कद रास नहीं आ रहा है। समर्थकों में इस घटना को लेकर काफी आक्रोश है और वे इसे अपने नेता का अपमान मान रहे हैं।
बीजेपी का बचाव और कांग्रेस का तीखा वार
इस पोस्टर कांड के बाद सियासी बयानबाजी का दौर तेज हो गया है। बीजेपी के दिग्गज नेता और मंत्री रामकृपाल यादव ने डैमेज कंट्रोल करते हुए कहा कि उन्होंने पोस्टर देखा ही नहीं है, इसलिए वे इस पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे। उन्होंने दावा किया कि एनडीए में ‘चट्टानी मजबूती’ है और पार्टी में कोई गुटबाजी नहीं है। लेकिन कांग्रेस ने इस आग में घी डालने का काम किया है। कांग्रेस प्रवक्ता डॉ. स्नेहाशीष वर्धन ने सीधा हमला बोलते हुए कहा कि बीजेपी के भीतर सत्ता संघर्ष अब खुलकर सामने आ गया है। कांग्रेस का दावा है कि सम्राट चौधरी के खिलाफ पार्टी के अंदर ही कोई बहुत बड़ा और रसूखदार नेता सक्रिय है, जो नहीं चाहता कि सम्राट सीएम की कुर्सी तक पहुंचें। कांग्रेस के मुताबिक, यह पोस्टर फाड़ना महज ट्रेलर है, असली फिल्म तो नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद शुरू होगी।
नीतीश के बाद कौन?
9 अप्रैल 2026 की यह घटना बिहार बीजेपी के लिए असहज करने वाली है। जिस वक्त पार्टी को एकजुट होकर नीतीश कुमार के विकल्प के तौर पर एक चेहरा पेश करना चाहिए, उस वक्त गुटबाजी की खबरें नेशनल हेडलाइंस बन रही हैं। सम्राट चौधरी फिलहाल मीडिया और अपने दौरों के जरिए खुद को सबसे मजबूत दावेदार के रूप में पेश कर रहे हैं, लेकिन ‘पोस्टर कांड’ ने यह साफ कर दिया है कि उनकी राह कांटों भरी है। क्या यह विरोध किसी क्षेत्रीय गुट का है या फिर दिल्ली दरबार के किसी इशारे पर यह सब हो रहा है? फिलहाल पटना की फिजाओं में यही सवाल तैर रहा है। 10 अप्रैल को नीतीश कुमार के शपथ ग्रहण के बाद बिहार में नेतृत्व परिवर्तन की सुगबुगाहट और तेज होगी, और तब यह देखना दिलचस्प होगा कि पोस्टर फाड़ने वाली ताकतें जीतती हैं या सम्राट चौधरी का तिलक होता है।
Read More- जिस ‘स्मारक’ नीति पर मायावती को घेरा, अब उसी राह पर योगी सरकार? लखनऊ में क्या होने वाला है नया
