बिहार की सियासत से आज एक ऐसी खबर सामने आई जिसने राजनीतिक पंडितों और आम जनता दोनों को चौंका दिया है। जनता दल यूनाइटेड (JDU) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के कद्दावर नेता नीतीश कुमार ने बिहार विधान परिषद (MLC) की सदस्यता से अपना इस्तीफा दे दिया है। सोमवार की सुबह जब जेडीयू के नेता नीतीश कुमार का त्यागपत्र लेकर विधान परिषद के सभापति के पास पहुंचे, तो वहां मौजूद हर कोई सन्न रह गया। अब तक ‘सुशासन बाबू’ के नाम से चर्चित नीतीश कुमार का यह कदम महज एक प्रशासनिक औपचारिकता है या फिर बिहार की सत्ता में किसी बहुत बड़े बदलाव का संकेत, इसे लेकर अटकलों का बाजार गर्म हो गया है।
आखिर क्यों छोड़नी पड़ी MLC की कुर्सी?
इस इस्तीफे के पीछे की संवैधानिक वजहें काफी महत्वपूर्ण हैं। दरअसल, नीतीश कुमार हाल ही में राज्यसभा के लिए निर्विरोध चुने गए थे। भारतीय संविधान के नियमों के मुताबिक, कोई भी व्यक्ति एक साथ राज्य विधानमंडल और संसद के दोनों सदनों का सदस्य नहीं रह सकता। राज्यसभा सांसद चुने जाने के बाद 14 दिनों के भीतर राज्य के सदन से इस्तीफा देना अनिवार्य होता है। नीतीश कुमार ने इसी संवैधानिक बाध्यता को पूरा करने के लिए आज अपना इस्तीफा सौंपा है। हालांकि, यह इस्तीफा तकनीकी तो है, लेकिन बिहार की मौजूदा परिस्थिति में इसके सियासी मायने बहुत गहरे निकाले जा रहे हैं। विपक्षी दल इसे नीतीश कुमार की ‘दिल्ली रवानगी’ और बिहार में ‘नेतृत्व परिवर्तन’ की पहली सीढ़ी मान रहे हैं।
कौन बनेगा बिहार का अगला ‘कैप्टन’?
नीतीश कुमार के इस्तीफे के साथ ही सबसे बड़ा सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि क्या वे मुख्यमंत्री पद पर बने रहेंगे? संवैधानिक रूप से नीतीश कुमार बिना किसी सदन का सदस्य रहे भी अगले छह महीनों तक मुख्यमंत्री रह सकते हैं, लेकिन सूत्रों की मानें तो बिहार में जल्द ही नई सरकार का स्वरूप देखने को मिल सकता है। कयास लगाए जा रहे हैं कि नीतीश कुमार अब केंद्र की राजनीति में बड़ी भूमिका निभाएंगे और बिहार की कमान किसी नए चेहरे को सौंपी जाएगी। भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जेडीयू के बीच पर्दे के पीछे चल रही बातचीत में सम्राट चौधरी का नाम मुख्यमंत्री की रेस में सबसे आगे चल रहा है। वहीं, कुछ लोग इसे नीतीश कुमार के उत्तराधिकारी के रूप में उनके बेटे निशांत कुमार की लॉन्चिंग से भी जोड़कर देख रहे हैं।
सत्ता के गलियारों में सस्पेंस और भविष्य की रणनीति
नीतीश कुमार के इस कदम ने बिहार की एनडीए (NDA) सरकार के भीतर भी हलचल पैदा कर दी है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि नीतीश कुमार अपनी छवि को एक बार फिर ‘त्याग’ वाली छवि के रूप में पेश करना चाहते हैं। विधान परिषद छोड़ना इस बात का संकेत है कि अब वे राज्य की स्थानीय राजनीति से खुद को ऊपर उठाकर राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन को चुनौती देने या एनडीए को मजबूती देने की तैयारी में हैं। बिहार की जनता अब यह देख रही है कि आने वाले 24 से 48 घंटों में पटना से क्या नया आदेश निकलता है। क्या वाकई बिहार को नया मुख्यमंत्री मिलने वाला है या नीतीश कुमार राज्यसभा सांसद के तौर पर ही मुख्यमंत्री की शपथ दोबारा लेंगे? सस्पेंस की यह चादर फिलहाल पूरे बिहार पर लिपटी हुई है।
Read More-“अब समय आ गया…” शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद की योगी सरकार को खुली चुनौती, ब्राह्मणों से की खास अपील
