महाराष्ट्र की राजनीति में उस वक्त हलचल मच गई जब खबर सामने आई कि उपमुख्यमंत्री अजित पवार के करीबी और राजनीतिक रणनीतिकार नरेश अरोरा के पुणे स्थित कार्यालय पर क्राइम ब्रांच की टीम पहुंची है. जैसे ही यह सूचना बाहर आई, सोशल मीडिया और कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर इसे “बड़ी छापेमारी” और “महत्वपूर्ण कार्रवाई” के तौर पर पेश किया जाने लगा. देखते ही देखते यह खबर सियासी रंग लेने लगी और चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया. नरेश अरोरा की पहचान अजित पवार के बेहद भरोसेमंद रणनीतिकार के रूप में होती है, इसलिए मामला सिर्फ एक दफ्तर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे सीधे सत्ता के गलियारों से जोड़कर देखा जाने लगा. हालांकि, शुरुआती शोर-शराबे के बीच यह साफ नहीं था कि पुलिस आखिर वहां क्यों पहुंची थी और क्या वाकई कोई आपराधिक कार्रवाई की गई है.
अजित पवार की सीधी सफाई: ‘रेड नहीं, सिर्फ कानूनी प्रक्रिया’
मामले ने जब तूल पकड़ लिया तो खुद उपमुख्यमंत्री अजित पवार को सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी पड़ी. उन्होंने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल ‘एक्स’ के जरिए विस्तार से बयान जारी किया और छापेमारी की खबरों को पूरी तरह अफवाह करार दिया. अजित पवार ने कहा कि क्राइम ब्रांच की टीम केवल कुछ जानकारियां जुटाने और कागजातों के सत्यापन के लिए दफ्तर पहुंची थी. उन्होंने यह भी साफ किया कि जांच के दौरान अधिकारियों को पूरा सहयोग दिया गया और वहां से किसी भी तरह की आपत्तिजनक सामग्री या गड़बड़ी सामने नहीं आई. डिप्टी सीएम ने यह संदेश देने की कोशिश की कि उनकी पार्टी और सरकार कानून का सम्मान करती है और किसी भी जांच से पीछे नहीं हटती. साथ ही उन्होंने नरेश अरोरा और उनकी कंपनी ‘डिज़ाइन बॉक्स’ के साथ मजबूती से खड़े होने की बात दोहराई.
पुलिस का बयान: न जब्ती, न हिरासत, न FIR
अफवाहों को पूरी तरह खत्म करने के लिए पुणे पुलिस की ओर से भी आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई. पुलिस कमिश्नर अमितेश कुमार ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि क्राइम ब्रांच की टीम किसी छापेमारी या बड़ी कार्रवाई के उद्देश्य से वहां नहीं गई थी. उन्होंने बताया कि पुलिस को कुछ प्राथमिक सूचनाएं मिली थीं, जिनके आधार पर सामान्य प्रक्रिया के तहत दफ्तर जाकर कागजातों का वेरिफिकेशन किया गया. कमिश्नर ने साफ किया कि न तो किसी तरह की जब्ती हुई है, न ही किसी व्यक्ति को हिरासत में लिया गया है और न ही इस मामले में कोई एफआईआर दर्ज की गई है. पुलिस के मुताबिक यह पूरी प्रक्रिया एक रूटीन जांच का हिस्सा थी, जिसे गलत तरीके से बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया. उन्होंने मीडिया और आम लोगों से अपील की कि बिना पुष्टि के फैलाई जा रही खबरों पर भरोसा न करें.
मामला कैसे बना राजनीतिक चर्चा का विषय?
दरअसल, इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत सोशल मीडिया पर फैली उन खबरों से हुई, जिनमें दावा किया गया कि अजित पवार के करीबी पर बड़ी रेड हुई है और भारी मात्रा में नकदी या अहम दस्तावेज बरामद किए गए हैं. जैसे ही पुलिस की मौजूदगी की जानकारी बाहर आई, कुछ प्लेटफॉर्म्स ने इसे सनसनीखेज रूप दे दिया. नरेश अरोरा का नाम सीधे तौर पर अजित पवार से जुड़ा होने के कारण यह मामला तेजी से राजनीतिक बहस में बदल गया. विपक्षी खेमे में चर्चाएं शुरू हो गईं, वहीं समर्थकों ने इसे साजिश करार दिया. हालांकि, पुलिस और खुद अजित पवार की सफाई के बाद यह साफ हो गया कि मामला उतना बड़ा नहीं था, जितना बताया जा रहा था. फिलहाल, पुलिस की ओर से स्पष्ट कर दिया गया है कि यह सिर्फ प्राथमिक जांच थी और अब इसे पूरा कर लिया गया है. बावजूद इसके, इस घटना ने एक बार फिर यह दिखा दिया कि राजनीति से जुड़े मामलों में अफवाहें कितनी तेजी से माहौल गरमा सकती हैं.
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