महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। BMC समेत राज्य की 29 महानगरपालिकाओं के चुनाव से पहले ठाकरे परिवार से जुड़ी दो बड़ी राजनीतिक ताकतें एक मंच पर आने की तैयारी में हैं। राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे के बीच संभावित गठबंधन को लेकर सियासी गलियारों में चर्चाएं तेज हैं। जानकारी के मुताबिक 23 दिसंबर से नामांकन प्रक्रिया शुरू होनी है और उससे ठीक एक दिन पहले, यानी 22 दिसंबर या फिर 23 दिसंबर की सुबह, दोनों नेता आधिकारिक तौर पर साथ आने का ऐलान कर सकते हैं। रणनीति साफ है—नामांकन से पहले तस्वीर स्पष्ट कर दी जाए ताकि उम्मीदवारों और कार्यकर्ताओं में कोई भ्रम न रहे। यह कदम अचानक नहीं है, बल्कि लंबे समय से चल रही अंदरूनी बातचीत और जमीनी फीडबैक का नतीजा माना जा रहा है। माना जा रहा है कि गठबंधन की घोषणा किसी बड़े सार्वजनिक मंच या संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए की जा सकती है, जिससे इसका संदेश सीधे जनता और पार्टी कैडर तक पहुंचे।
मनसे–शिवसेना यूबीटी का गठबंधन: किसे होगा फायदा?
संभावित गठबंधन में राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) शामिल होंगी। दोनों दलों का पारंपरिक वोट बैंक भले अलग-अलग रहा हो, लेकिन शहरी महाराष्ट्र में इनकी पकड़ आज भी मजबूत मानी जाती है। खासकर मुंबई, ठाणे, पुणे, नासिक और औरंगाबाद जैसे महानगरों में यह गठबंधन बड़ा असर डाल सकता है। BMC चुनाव को महाराष्ट्र की राजनीति का सेमीफाइनल कहा जाता है, और ऐसे में ठाकरे भाइयों का साथ आना समीकरण पूरी तरह बदल सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह गठबंधन मराठी अस्मिता, शहरी मुद्दों और स्थानीय नेतृत्व को केंद्र में रखकर चुनावी मैदान में उतरेगा। इससे न केवल दोनों दलों के वोट शेयर में इजाफा हो सकता है, बल्कि बिखरे हुए विपक्षी वोटों का एकीकरण भी संभव है।
नाराज उम्मीदवारों पर ब्रेक: अंदरूनी रणनीति क्या है?
ठाकरे भाइयों के इस मास्टर स्ट्रोक का सबसे अहम पहलू है—नाराज उम्मीदवारों को संभालना। पिछले कुछ चुनावों में देखा गया है कि टिकट न मिलने या आपसी खींचतान के कारण कई नेता पाला बदल लेते हैं। इस बार गठबंधन की टाइमिंग भी इसी रणनीति से जुड़ी मानी जा रही है। नामांकन से ठीक पहले गठबंधन का ऐलान कर यह संदेश दिया जाएगा कि दोनों दल मिलकर चुनाव लड़ेंगे और सीट बंटवारे को लेकर स्पष्ट फार्मूला अपनाया जाएगा। इससे उन नेताओं की गुंजाइश कम हो जाएगी जो असंतोष के चलते भारतीय जनता पार्टी या एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना में जाने की सोच रहे थे। माना जा रहा है कि साझा समन्वय समिति, संयुक्त उम्मीदवार चयन और स्थानीय स्तर पर संवाद जैसी व्यवस्थाएं भी गठबंधन के साथ ही घोषित की जा सकती हैं, ताकि किसी तरह की टूट-फूट को रोका जा सके।
बीजेपी–शिंदे गुट के खिलाफ सीधी चुनौती
राजनीतिक जानकारों की नजर में ठाकरे भाइयों का यह कदम सीधे तौर पर बीजेपी और एकनाथ शिंदे गुट को चुनौती देने वाला है। पिछले कुछ वर्षों में सत्ता समीकरण बदले हैं और शिवसेना के विभाजन के बाद उद्धव ठाकरे को बड़ा झटका लगा था। वहीं, राज ठाकरे भी लगातार नए सिरे से अपनी पार्टी को मजबूत करने की कोशिश में हैं। ऐसे में दोनों का साथ आना केवल चुनावी समझौता नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी है—कि ठाकरे ब्रांड अब भी महाराष्ट्र की राजनीति में प्रासंगिक है। अगर यह गठबंधन जमीन पर मजबूत तरीके से उतरा, तो महानगरपालिकाओं के नतीजे राज्य की आगे की राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं। आने वाले दिनों में सीट बंटवारे, साझा घोषणापत्र और रैली की तारीखों को लेकर और भी बड़े ऐलान होने की संभावना है, जिसने पहले से ही सियासी तापमान बढ़ा दिया है।
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