खेती में बढ़ती लागत, मौसम की मार और फसलों के अनिश्चित दामों के बीच किसान अब ऐसे विकल्प खोज रहे हैं, जो कम जोखिम में लंबे समय तक भरोसेमंद कमाई दे सकें। इसी तलाश में बांस की खेती एक मजबूत समाधान बनकर सामने आई है। खास बात यह है कि इसके लिए किसान को अपनी मुख्य खेती छोड़ने की जरूरत नहीं पड़ती। खेत की मेढ़, जो अक्सर बेकार पड़ी रहती है, वही जगह बांस के जरिए आमदनी का जरिया बन सकती है। मेढ़ पर लगाया गया बांस न केवल खेत की स्थायी बाउंड्री तैयार करता है बल्कि जानवरों से फसल की सुरक्षा भी करता है। धीरे-धीरे यही बांस किसान की आय का मजबूत सहारा बन जाता है। बांस की मांग गांव से लेकर शहर तक लगातार बनी रहती है—घर निर्माण, फर्नीचर, पूजा-पाठ, कृषि उपकरण और उद्योगों में इसका उपयोग होता है। यही वजह है कि बांस की खेती को कम जोखिम और ज्यादा भरोसे वाली खेती माना जा रहा है।
ठंड का मौसम क्यों माना जाता है बांस लगाने का सबसे सही समय
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार बांस लगाने के लिए सर्दियों का मौसम सबसे उपयुक्त होता है। इस समय मिट्टी में नमी बनी रहती है और कीट-पतंगों व दीमक का प्रकोप भी कम होता है, जिससे पौधे की शुरुआती बढ़वार बेहतर होती है। रबी फसलों के दौरान किसान जब खेत की नियमित सिंचाई करता है, उसी पानी से मेढ़ पर लगे बांस के पौधों को भी पर्याप्त नमी मिल जाती है। इससे अलग से सिंचाई का खर्च नहीं बढ़ता। बांस की खेती राइजोम या पौध के माध्यम से की जाती है, जिसे गड्ढा खोदकर लगाया जाता है। ठंड के मौसम में लगाया गया बांस जल्दी जड़ पकड़ लेता है और आने वाले वर्षों में तेजी से बढ़ता है। किसानों के लिए यह बड़ी राहत है कि बांस की देखभाल उनकी मुख्य फसल के साथ ही हो जाती है, जिससे अतिरिक्त मेहनत और मजदूरी दोनों की बचत होती है।
कम लागत, कम देखभाल और लंबे समय तक फायदा
बांस की खेती की सबसे बड़ी खूबी यही है कि इसे बहुत उपजाऊ जमीन की जरूरत नहीं होती। सामान्य मिट्टी में भी बांस अच्छी तरह उग जाता है। न ज्यादा पानी चाहिए, न ही महंगे रासायनिक खाद की आवश्यकता होती है। गोबर की खाद और समय-समय पर हल्की निराई-गुड़ाई से पौधे स्वस्थ रहते हैं। शुरुआती दो-तीन वर्षों में खरपतवार नियंत्रण जरूरी होता है ताकि युवा पौधों को पूरा पोषण मिल सके। खेत की मेढ़ों के अलावा किसान चाहें तो खाली पड़ी जमीन या खेत के कोनों में भी बांस लगा सकते हैं। सही दूरी पर लगाए गए बांस के पौधे धीरे-धीरे घने गुच्छों में बदल जाते हैं। एक बार पौधे स्थापित हो जाने के बाद इनकी देखभाल बेहद आसान हो जाती है, जिससे किसान बिना ज्यादा खर्च किए लगातार फायदा उठा सकता है।
4×4 मीटर की दूरी और 40 साल तक चलने वाली कमाई
विशेषज्ञों के मुताबिक अगर एक एकड़ खेत की मेढ़ों पर लगभग 4×4 मीटर की दूरी पर बांस लगाया जाए तो 4 से 5 साल में कटाई शुरू हो जाती है। एक गुच्छे से 3 से 5 मजबूत बांस निकलते हैं और अनुमान के अनुसार 20 से 60 टन प्रति एकड़ तक उत्पादन संभव है। सबसे खास बात यह है कि पहली कटाई के बाद बांस दोबारा खुद ही उग आता है। एक बार सही तरीके से स्थापित होने के बाद बांस 40 साल या उससे भी अधिक समय तक लगातार उत्पादन देता है। बम्बूसा बालकोआ और बम्बूसा तुल्दा जैसी किस्में व्यावसायिक रूप से ज्यादा लाभकारी मानी जाती हैं। इसके साथ ही राष्ट्रीय बांस मिशन जैसी सरकारी योजनाओं के तहत किसानों को करीब 50 प्रतिशत तक सब्सिडी भी मिलती है, जिससे शुरुआती लागत काफी कम हो जाती है। यही कारण है कि बांस की खेती को आज के समय में खेती का सबसे सुरक्षित और टिकाऊ निवेश माना जा रहा है।
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