Monday, February 2, 2026
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ब्रिटिश संसद में क्यों गूंजा ‘कामसूत्र’ का जिक्र? प्रधानमंत्री स्टार्मर की एक टिप्पणी ने हिला दी राजनीति

ब्रिटिश संसद में प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर की ‘कामसूत्र’ टिप्पणी से मचा बवाल। विपक्ष के हमले, सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया और लेबर सरकार की नीतिगत चुनौतियों की पूरी कहानी पढ़ें।

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ब्रिटेन की संसद हाउस ऑफ कॉमन्स उस समय असहज माहौल में डूब गई, जब प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के मुंह से एक ऐसा शब्द निकल गया, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। प्रधानमंत्री प्रश्नकाल के दौरान विपक्ष की तीखी आलोचना का सामना कर रहे स्टार्मर ने जवाब देते हुए मजाकिया लहजे में कहा कि “विपक्ष ने पिछले 14 वर्षों में कामसूत्र से भी ज्यादा बार अपने पोजीशन बदले हैं।” यह टिप्पणी सुनते ही सदन में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया। सत्ता और विपक्ष दोनों खेमों में बैठे सांसद असहज नजर आए। विपक्ष ने इसे प्रधानमंत्री पद की गरिमा के खिलाफ बताया, जबकि सत्तापक्ष के कुछ सांसद भी असहज हंसी के साथ नजरें झुकाते दिखे। ब्रिटिश राजनीति में आमतौर पर तीखे कटाक्ष तो देखने को मिलते हैं, लेकिन इस तरह के सांस्कृतिक संदर्भ का संसद में इस्तेमाल दुर्लभ माना जा रहा है।

विपक्ष का हमला: मजाक नहीं, जिम्मेदारी चाहिए

प्रधानमंत्री की इस टिप्पणी के तुरंत बाद विपक्षी दलों ने स्टार्मर पर हमला तेज कर दिया। विपक्षी नेता केमी बैडेनोच ने कहा कि देश गंभीर आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों से गुजर रहा है और ऐसे समय में प्रधानमंत्री का इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करना उनकी प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करता है। विपक्ष का आरोप है कि यह बयान सरकार की नीतिगत विफलताओं से ध्यान भटकाने की कोशिश है। कई सांसदों ने कहा कि जनता महंगाई, स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और आवास संकट से परेशान है, जबकि प्रधानमंत्री हल्के-फुल्के तंज में समय गंवा रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह प्रतिक्रिया सिर्फ एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस बढ़ते असंतोष को दर्शाती है जो लेबर सरकार के शुरुआती महीनों में ही उभरने लगा है।

सोशल मीडिया पर बवाल, नेतृत्व शैली पर उठे सवाल

संसद की कार्यवाही का वीडियो जैसे ही सोशल मीडिया पर सामने आया, यह तेजी से वायरल हो गया। कुछ लोगों ने इसे प्रधानमंत्री का हास्यबोध बताया, तो बड़ी संख्या में यूजर्स ने इसे गैर-जिम्मेदाराना और अशोभनीय करार दिया। ट्विटर, फेसबुक और अन्य प्लेटफॉर्म पर यह चर्चा छिड़ गई कि क्या प्रधानमंत्री को संसद में इस तरह की भाषा का प्रयोग करना चाहिए। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह विवाद स्टार्मर की संचार शैली की कमजोरियों को उजागर करता है। उनका मानना है कि स्टार्मर अभी तक यह संतुलन नहीं बना पाए हैं कि कब सख्त नेता की भूमिका निभानी है और कब हल्के अंदाज में बात करनी है। आलोचकों के अनुसार, यह टिप्पणी जनता की भावनाओं से कटे होने का संकेत देती है, खासकर तब जब देश की अर्थव्यवस्था दबाव में है और आम लोग सरकार से ठोस समाधान की उम्मीद कर रहे हैं।

नीतियों की चुनौती और भरोसे की परीक्षा

यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब लेबर सरकार पहले से ही कई मोर्चों पर दबाव झेल रही है। सत्ता संभालने के बाद प्रधानमंत्री स्टार्मर ने हर साल तीन लाख नए घर बनाने का वादा किया था, लेकिन बढ़ती निर्माण लागत, श्रमिकों की कमी और उद्योगों के असंतोष ने इस लक्ष्य को मुश्किल बना दिया है। न्यूनतम मजदूरी में वृद्धि और नए रोजगार कर जैसे फैसलों से कारोबारी वर्ग में नाराजगी है। डिजिटल आईडी जैसी योजनाएं भी गोपनीयता और क्रियान्वयन को लेकर सवालों में घिरी हुई हैं। ऐसे माहौल में संसद में दिया गया यह बयान सरकार की विश्वसनीयता की परीक्षा बन गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अब लेबर पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ नीतियां बनाना नहीं, बल्कि अपने नेतृत्व और संवाद शैली से जनता का भरोसा जीतना है। हाउस ऑफ कॉमन्स में हुआ यह वाकयुद्ध साफ संकेत देता है कि आने वाले दिनों में स्टार्मर सरकार को हर कदम बेहद सोच-समझकर उठाना होगा।

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