सुप्रीम कोर्ट ने यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) द्वारा जनवरी 2026 में लागू किए गए नए नियमों पर फिलहाल रोक लगा दी है और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या की पीठ ने साफ शब्दों में कहा कि UGC के नए नियम कई अहम बिंदुओं पर अस्पष्ट हैं और इन्हें मौजूदा स्वरूप में लागू करना भविष्य में गंभीर विवादों को जन्म दे सकता है। अदालत ने कहा कि नियमों की भाषा इतनी साफ नहीं है कि यह तय किया जा सके कि शिकायतों की जांच निष्पक्ष तरीके से कैसे होगी और दुरुपयोग को कैसे रोका जाएगा। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि जब तक नए नियमों को दोबारा स्पष्ट और पारदर्शी तरीके से तैयार नहीं किया जाता, तब तक उच्च शिक्षा संस्थानों में व्यवस्था 2012 वाले पुराने ढांचे के अनुसार ही चलेगी। कोर्ट की इस टिप्पणी को UGC और केंद्र सरकार दोनों के लिए एक बड़ा संकेत माना जा रहा है कि सामाजिक न्याय जैसे संवेदनशील मुद्दों पर नियम बनाते समय प्रक्रिया की स्पष्टता उतनी ही जरूरी है जितनी मंशा की शुद्धता।
क्या थे UGC के 2012 वाले नियम
साल 2012 में UGC ने उच्च शिक्षा संस्थानों को यह सलाह दी थी कि वे अपने कैंपस में Equal Opportunity Cell (EOC) का गठन करें। इस सेल का उद्देश्य अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) से आने वाले छात्रों की शिकायतों को सुनना और कैंपस में समानता का माहौल बनाना था। हालांकि, यह व्यवस्था अनिवार्य नहीं थी बल्कि केवल एक सलाह के रूप में दी गई थी। EOC को शिकायतें सुनने और प्रशासन को कार्रवाई की सिफारिश करने का अधिकार तो था, लेकिन इसमें न तो जांच पूरी करने की कोई समय-सीमा तय थी और न ही यह स्पष्ट था कि शिकायतों पर कब और कैसे निर्णय लिया जाएगा। सबसे बड़ी कमी यह थी कि यदि कोई विश्वविद्यालय या कॉलेज इन नियमों का पालन नहीं करता, तो UGC के पास उस पर कोई ठोस कार्रवाई करने की शक्ति नहीं थी। न तो फंडिंग रोकी जा सकती थी, न मान्यता पर असर डाला जा सकता था और न ही किसी तरह का जुर्माना लगाया जा सकता था। इसके अलावा, 2012 के नियम केवल SC और ST तक सीमित थे, जबकि OBC, EWS, दिव्यांग (PwD) और अन्य सामाजिक समूहों का इनमें कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं था। यही वजह रही कि इन नियमों को कई बार ‘अधूरे और कमजोर’ कहा गया।
2026 के नए UGC नियमों में क्या था बड़ा बदलाव
UGC ने जनवरी 2026 में Equity in Higher Education Institutions Regulations जारी किए, जिनका मकसद कैंपस में जाति-आधारित भेदभाव को रोकना और छात्रों, शिक्षकों व कर्मचारियों के लिए सुरक्षित माहौल बनाना बताया गया। इन नए नियमों में सबसे बड़ा बदलाव यह था कि अब हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में Equal Opportunity Centre बनाना अनिवार्य कर दिया गया। इसके भीतर एक शक्तिशाली Equity Committee गठित करने का प्रावधान था, जिसे पहले की तुलना में कहीं अधिक अधिकार दिए गए थे। नए नियमों में 24×7 शिकायत तंत्र, ऑनलाइन पोर्टल और सख्त समय-सीमा तय की गई थी। जैसे शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर प्रारंभिक बैठक, 15 दिनों में जांच रिपोर्ट और सात दिनों के अंदर कार्रवाई। इतना ही नहीं, नियमों का पालन न करने पर UGC को यह अधिकार दिया गया कि वह संस्थान की फंडिंग रोक सके, मान्यता प्रभावित कर सके और नए कोर्स की मंजूरी तक रोक दे। वरिष्ठ वकील अस्था अनुप चतुर्वेदी के अनुसार, नए नियम कोई नया अधिकार नहीं देते, बल्कि पुराने अधिकारों को लागू करवाने की ताकत देते हैं। यानी जो पहले केवल सलाह थी, वह अब बाध्यकारी नियम बन गया था। यही सख्ती कई संस्थानों के लिए चिंता का कारण बनी।
विवाद की जड़ और सुप्रीम कोर्ट की दो अहम चिंताएं
नए UGC नियमों को लेकर विवाद यहीं से शुरू हुआ। कई शिक्षाविदों और प्रशासकों ने सवाल उठाया कि जब संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 17 पहले से ही समानता का अधिकार देते हैं, SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम मौजूद है, और विश्वविद्यालयों में पहले से एंटी-रैगिंग सेल, इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी और ऑनलाइन शिकायत पोर्टल चल रहे हैं, तो नए नियमों की जरूरत क्यों पड़ी। सबसे बड़ी चिंता यह जताई गई कि नए नियमों में दुरुपयोग रोकने के लिए कोई स्पष्ट प्रक्रिया नहीं बताई गई है। जैसे फर्जी शिकायत की पहचान कैसे होगी, सबूत का मानक क्या होगा, अपील की प्रक्रिया कैसी होगी और जांच के दौरान शिकायतकर्ता व आरोपी दोनों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट पहले ही दो सिद्धांतों पर जोर देता रहा है—जाति-आधारित अपमान पर जीरो टॉलरेंस और जांच में पूरी निष्पक्षता। आलोचकों का कहना है कि नए नियम पहले सिद्धांत को तो मजबूती से अपनाते हैं, लेकिन दूसरे यानी निष्पक्ष और स्पष्ट प्रक्रिया को लेकर पर्याप्त दिशा-निर्देश नहीं देते। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल 2012 के ढांचे को बहाल करते हुए केंद्र सरकार से कहा है कि वह नए नियमों को और ज्यादा स्पष्ट, संतुलित और व्यावहारिक बनाकर दोबारा पेश करे।
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