नेपाल में आई भीषण बाढ़ ने कई परिवारों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी है। नुवाकोट जिले के बेत्रावती और आसपास के इलाकों में बाढ़ के कई दिन बाद भी लोग लापता अपनों की तलाश में भटक रहे हैं। किसी को माता-पिता की चिंता है तो कोई पत्नी और बच्चों के मिलने की उम्मीद लगाए बैठा है। 43 वर्षीय लेखनाथ अधिकारी भी पिछले चार दिनों से अपने बूढ़े माता-पिता की तलाश कर रहे हैं। वह कभी राहत शिविर पहुंचते हैं, कभी अस्पताल और कभी बचाव केंद्रों में जानकारी जुटाते हैं। बाढ़ के कारण खराब हुए रास्तों ने उनकी मुश्किल और बढ़ा दी है। जिस सफर में पहले करीब दो घंटे लगते थे, अब उसे पूरा करने में लगभग चार घंटे लग रहे हैं। अधिकारी की पत्नी और बच्चे बाढ़ के दौरान सुरक्षित ऊंची जगह पहुंच गए थे, लेकिन उनके माता-पिता तेज पानी की चपेट में आ गए। एक जगह तीन शव मिलने की सूचना पर वह तुरंत वहां पहुंचे, मगर उनमें उनके माता-पिता नहीं थे।
‘जिंदा हों तो मिल जाएं, नहीं तो अंतिम विदाई दे सकूं’
अधिकारी अब भी अपने माता-पिता का सुराग पाने की उम्मीद नहीं छोड़ रहे हैं। उनका कहना है कि अगर माता-पिता जिंदा हैं तो वह उन्हें वापस देखना चाहते हैं और अगर उनकी मौत हो चुकी है तो कम से कम उनके शव मिल जाएं, ताकि वह सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर सकें। उन्होंने पत्नी और बच्चों को काठमांडू में रिश्तेदारों के पास भेज दिया है, जबकि खुद तलाश में जुटे हुए हैं। उन्होंने कम से कम दो सप्ताह तक खोज जारी रखने का फैसला किया है। वहीं 35 वर्षीय नवीन तमांग की कहानी भी बेहद दर्दनाक है। वह मलेशिया में काम करते थे और बाढ़ की खबर मिलने के बाद पत्नी और दो बेटियों की तलाश में नेपाल लौटे हैं। उन्होंने राहत शिविरों में सेना के रिकॉर्ड में परिवार की जानकारी दर्ज कराई और बचाए गए लोगों की सूची भी देखी, लेकिन अब तक कोई सुराग नहीं मिला है। समय बीतने के साथ शवों की तलाश मुश्किल हो रही है, फिर भी परिवारों की उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
मां का हाथ छूटा तो भाइयों ने मान लिया सबसे बुरा सच
बाढ़ के बाद कई परिवारों के सामने ऐसा दर्द है, जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है। उमरकोट के भैंसी बाजार में वासुदेव और अर्जुन पयाकुरियाल ने अपनी मां का शव न मिलने के बावजूद अंतिम संस्कार की पारंपरिक प्रक्रिया शुरू करने का फैसला किया। बाढ़ के दौरान वासुदेव अपनी मां का हाथ पकड़े हुए थे, लेकिन तेज बहाव के बीच उनकी पकड़ छूट गई और मां पानी में बह गईं। तीन दिन तक खोजने के बाद भी कोई जानकारी नहीं मिली। आखिरकार दोनों भाइयों ने मां की मृत्यु मानकर खेत में साल के पेड़ के नीचे ‘क्रिया कुटी’ बनाई। पारंपरिक रीति के अनुसार कुश घास से मां की प्रतीकात्मक आकृति तैयार की गई और उसके जरिए अंतिम संस्कार से जुड़ी रस्में शुरू की गईं। परिवारों के लिए यह फैसला उम्मीद छोड़ना नहीं, बल्कि लंबे इंतजार के बीच मजबूरी में स्वीकार किया गया एक बेहद भावुक कदम है।
रुकी हुई घड़ी बता रही है बेत्रावती की तबाही की कहानी
बेत्रावती में बाढ़ का असर सिर्फ घरों और सड़कों तक सीमित नहीं रहा। कई इमारतें पानी और मलबे की चपेट में आकर तबाह हो गईं। गांव में मौजूद एक घंटाघर अब भी खड़ा है, लेकिन उसकी घड़ी की सुइयां करीब सुबह 9:30 बजे पर रुकी हुई हैं। स्थानीय लोगों के लिए यह घड़ी अब उस भयावह वक्त की निशानी बन गई है, जब बाढ़ ने इलाके की जिंदगी बदल दी। सुरक्षाबल और स्थानीय लोग लगातार मलबे, जंगलों और दुर्गम इलाकों में लापता लोगों को खोज रहे हैं। हर बरामद शव के साथ परिजनों के मन में एक साथ डर और उम्मीद पैदा होती है। डर इस बात का कि कहीं शव उनका अपना न हो और उम्मीद इस बात की कि शायद अगली खबर उनके लापता परिजन के सुरक्षित मिलने की हो। नेपाल में राहत और खोज अभियान जारी है, लेकिन हर गुजरता दिन इन परिवारों के इंतजार को और कठिन बना रहा है।
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