तेलंगाना के हनमकोंडा जिले से सामने आई एक भयावह घटना ने पूरे राज्य को झकझोर कर रख दिया है। श्यामपेट और अरेपल्ली गांवों में बीते कुछ दिनों के भीतर बड़े पैमाने पर आवारा कुत्तों को मारने का आरोप लगा है। शुरुआती शिकायतों के अनुसार, महज तीन दिनों में करीब 300 कुत्तों को कथित तौर पर मौत के घाट उतार दिया गया और उनकी लाशों को गांव के अलग-अलग इलाकों में सामूहिक कब्रों में दफना दिया गया। यह घटना ऐसे समय सामने आई है, जब देश के कई हिस्सों में कुत्तों के हमलों को लेकर डर और बहस पहले से मौजूद है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अचानक इलाके से कुत्तों का गायब होना और जमीन खोदने के निशान इस सामूहिक हत्या की ओर इशारा कर रहे थे। जब पशु प्रेमियों और सामाजिक संगठनों ने इसकी पड़ताल शुरू की, तब यह मामला खुलकर सामने आया और पुलिस तक पहुंचा।
पैसे देकर लगवाए गए जहरीले इंजेक्शन, 9 लोगों पर दर्ज हुआ केस
जांच में सामने आया है कि गांव स्तर पर यह कार्रवाई सुनियोजित तरीके से की गई। आरोप है कि दो लोगों को पैसे देकर खास तौर पर हायर किया गया, जिन्होंने कुत्तों को घातक विषैले इंजेक्शन दिए। इंजेक्शन देने के बाद कुत्तों की मौत हो गई और फिर उनके शवों को गड्ढों में दफना दिया गया। इस मामले में पुलिस ने दोनों गांवों के सरपंचों, उप सरपंच, ग्राम सचिवों और कुछ दिहाड़ी मजदूरों सहित कुल 9 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की है। मामला भारतीय न्याय संहिता की धारा 325 और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम की धारा 11 के तहत दर्ज किया गया है। पुलिस का कहना है कि प्राथमिक जांच में यह स्पष्ट हुआ है कि यह कोई प्राकृतिक मौत या बीमारी का मामला नहीं है, बल्कि जानबूझकर की गई सामूहिक हत्या है। इस खुलासे के बाद स्थानीय प्रशासन और पंचायत व्यवस्था की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
110 से ज्यादा शव निकाले गए
मामले की गंभीरता को देखते हुए पशु चिकित्सकों की एक टीम बनाई गई, जिसने अब तक 110 से अधिक कुत्तों के शव सामूहिक कब्रों से बाहर निकाले हैं। इन शवों का पोस्टमार्टम किया गया है ताकि मौत के असली कारणों की पुष्टि हो सके। पोस्टमार्टम के दौरान लिए गए नमूनों को क्षेत्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (RFSL) भेजा गया है। अधिकारियों का कहना है कि फोरेंसिक रिपोर्ट से यह साफ हो जाएगा कि कुत्तों को कौन सा जहर दिया गया और यह पूरी प्रक्रिया कितनी योजनाबद्ध थी। इस पूरे मामले को सबसे पहले उजागर करने में आवारा पशु फाउंडेशन ऑफ इंडिया की अहम भूमिका रही। संस्था के सदस्यों ने दफनाए गए स्थलों की पहचान की और इसके बाद संबंधित अधिकारियों को औपचारिक शिकायत सौंपी। संगठन का आरोप है कि जन शिकायतों के नाम पर जानवरों के साथ अमानवीय व्यवहार किया गया, जो कानून और संवेदनशीलता दोनों के खिलाफ है।
संख्या को लेकर विवाद, पुलिस की अपील और पशु प्रेमियों का गुस्सा
हालांकि इस मामले में मृत कुत्तों की संख्या को लेकर विरोधाभास भी सामने आया है। स्थानीय पुलिस आयुक्त सनप्रीत सिंह ने कहा है कि प्रारंभिक जांच के अनुसार मारे गए कुत्तों की संख्या 300 नहीं बल्कि करीब 50 हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि जांच अभी जारी है और अंतिम आंकड़ा फोरेंसिक रिपोर्ट के बाद ही साफ होगा। पुलिस ने पंचायतों और स्थानीय निकायों से अपील की है कि आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने के लिए अवैध और हिंसक तरीकों का सहारा न लें। इसके बजाय नसबंदी और टीकाकरण जैसे मानवीय उपाय अपनाए जाएं, जिन्हें एबीसी (एनिमल बर्थ कंट्रोल) कार्यक्रम के तहत लागू किया जाता है। दूसरी ओर इस घटना से डॉग लवर्स और पशु अधिकार कार्यकर्ता बेहद नाराज हैं। उनका कहना है कि अगर प्रशासन कानून के दायरे में रहकर काम करता, तो सैकड़ों बेजुबान जानवरों की जान नहीं जाती। अब यह मामला सिर्फ दो गांवों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे राज्य में आवारा जानवरों के प्रबंधन और मानवीय व्यवहार पर एक बड़ी बहस को जन्म दे चुका है।
