कलकत्ता हाई कोर्ट में उस समय असहज स्थिति पैदा हो गई, जब एक वकील को सुनवाई के दौरान थूक से दस्तावेजों के पन्ने पलटते हुए देखा गया. यह घटना न्यायमूर्ति अमृता सिन्हा की अदालत में हुई, जहां मामला सामान्य रूप से आगे बढ़ रहा था. तभी अदालत की कार्यवाही के दौरान वकील की इस हरकत पर जज की नजर पड़ गई. न्यायमूर्ति सिन्हा ने तुरंत सुनवाई रोकते हुए कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि इस तरह का व्यवहार बेहद अस्वास्थ्यकर है. उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि कोर्ट जैसे सार्वजनिक और संवेदनशील स्थान पर ऐसी आदत बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है. अदालत में मौजूद अन्य वकील और कर्मचारी भी इस टिप्पणी से चौंक गए. यह घटना न सिर्फ शिष्टाचार, बल्कि स्वास्थ्य और स्वच्छता से जुड़े बुनियादी नियमों पर भी सवाल खड़े करती है.
‘थूक से पन्ने मत पलटिए’, जज की दो टूक चेतावनी
जैसे ही न्यायमूर्ति अमृता सिन्हा ने वकील को थूक से पन्ने पलटते देखा, उन्होंने तुरंत कहा, “कृपया थूक से पन्ने न पलटें, यह बहुत ही अस्वास्थ्यकर है.” जज की यह टिप्पणी सीधे और सख्त लहजे में थी. कुछ क्षण बाद वकील ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए खेद जताया. इसके बाद न्यायमूर्ति सिन्हा ने एक और सवाल किया कि वकील ने अदालत में पहनने वाला पारंपरिक बैंड क्यों नहीं पहना है. भारतीय अदालतों में वकीलों के लिए ड्रेस कोड का पालन करना अनिवार्य माना जाता है, जिसमें कोट के साथ सफेद बैंड पहनना शामिल है. वकील ने इस पर जवाब दिया कि वह बैंड पहनना भूल गए थे. इस पर जज ने स्पष्ट कर दिया कि कोर्ट में पेश होते समय अनुशासन और नियमों का पालन बेहद जरूरी है.
‘पहले हाथ धोकर आइए’, सुनवाई रोकने का सख्त रुख
मामला यहीं खत्म नहीं हुआ. न्यायमूर्ति अमृता सिन्हा ने वकील से कहा कि वह पहले कोर्ट रूम से बाहर जाकर अपने हाथ धोकर आएं. जज ने सख्त लहजे में यह भी कहा कि अगर वकील हाथ नहीं धोते हैं, तो वह इस मामले की आगे सुनवाई नहीं करेंगी. यह बयान अपने आप में एक कड़ा संदेश था कि अदालत में स्वच्छता और शिष्टाचार से कोई समझौता नहीं किया जाएगा. इसके बाद वकील कोर्ट से बाहर गए और हाथ धोकर लौटे. तभी न्यायाधीश ने दोबारा मामले की सुनवाई शुरू की. इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो भी सामने आया है, जो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है. लोग इस वीडियो को देखकर अदालत में अनुशासन और स्वच्छता को लेकर जज के रुख की सराहना कर रहे हैं.
कोर्ट की गरिमा और सार्वजनिक स्वास्थ्य का संदेश
इस घटना ने एक बार फिर यह साफ कर दिया कि अदालत केवल कानूनी बहस का मंच नहीं है, बल्कि यह अनुशासन, मर्यादा और जिम्मेदारी का भी प्रतीक है. न्यायमूर्ति अमृता सिन्हा की प्रतिक्रिया ने यह संदेश दिया कि कोर्ट रूम में मौजूद हर व्यक्ति को न सिर्फ कानून, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता के नियमों का भी पालन करना चाहिए. खासकर कोविड के बाद के दौर में, जब स्वच्छता को लेकर जागरूकता और भी बढ़ गई है, ऐसी हरकतों को हल्के में नहीं लिया जा सकता. कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना वकीलों और अन्य कोर्ट कर्मियों के लिए एक सीख है कि पेशेवर आचरण केवल तर्क और बहस तक सीमित नहीं होता, बल्कि व्यवहार और आदतों में भी दिखना चाहिए. यह मामला बताता है कि छोटी सी लापरवाही भी अदालत की कार्यवाही को रोक सकती है और सार्वजनिक रूप से फटकार का कारण बन सकती है.
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