पश्चिम मध्य रेलवे (WCR) के भोपाल मंडल से जुड़ा यह मामला सामने आते ही रेलवे की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। वर्षों तक विभाग की सेवा करने के बाद जब कर्मचारी रिटायर होते हैं, तो उन्हें विदाई समारोह में सम्मान के प्रतीक के रूप में चांदी का सिक्का दिया जाता है। यह सिक्का सिर्फ एक धातु नहीं, बल्कि कर्मचारी की पूरी सेवा यात्रा की याद माना जाता है। लेकिन अब यही सम्मान कई रिटायर्ड कर्मचारियों के लिए अपमान और ठगी का कारण बन गया है। जब कुछ पूर्व कर्मचारियों ने आर्थिक जरूरत के चलते इन सिक्कों को बाजार में बेचने की कोशिश की, तब चौंकाने वाला सच सामने आया। जौहरियों द्वारा की गई जांच में पता चला कि जिन्हें शुद्ध चांदी समझा जा रहा था, उनमें चांदी नाममात्र की है और अधिकांश हिस्सा तांबे का है। इस खुलासे के बाद रिटायर्ड कर्मचारियों में गहरा रोष और निराशा है, क्योंकि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि जिस विभाग को उन्होंने अपना जीवन दिया, वही उनके सम्मान के साथ ऐसा खिलवाड़ करेगा।
जांच में बड़ा खुलासा: 99.9% की जगह सिर्फ 0.23% चांदी
मामले के उजागर होने के बाद रेलवे विजिलेंस की जांच में कई हैरान करने वाले तथ्य सामने आए। जांच रिपोर्ट के अनुसार, जिन सिक्कों को रेलवे ने ‘शुद्ध चांदी’ बताकर वितरित किया, उनमें चांदी की मात्रा महज 0.23 प्रतिशत पाई गई, जबकि नियमों के अनुसार यह 99.9 प्रतिशत होनी चाहिए थी। बाकी पूरा सिक्का तांबे से बना हुआ था। रिटायर्ड कर्मचारी डीके गौतम जैसे कई लोगों ने इस पर अपनी पीड़ा जाहिर करते हुए कहा कि यह सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि मानसिक आघात भी है। उनका कहना है कि ये सिक्के उन्होंने कभी बेचने के लिए नहीं रखे थे, बल्कि विभाग की यादगार समझकर संभालकर रखे थे। जैसे ही सच्चाई सामने आई, उन्हें लगा कि वर्षों की ईमानदार सेवा के बदले उन्हें नकली सम्मान दिया गया। यह सवाल भी उठ रहा है कि इतने लंबे समय तक यह घोटाला कैसे चलता रहा और किसी स्तर पर इसकी गुणवत्ता जांच क्यों नहीं हुई।
90 लाख से ज्यादा की चपत
रेलवे रिकॉर्ड के मुताबिक, यह घोटाला कोई एक-दो महीने का नहीं बल्कि करीब तीन साल से चल रहा था। पश्चिम मध्य रेलवे ने इंदौर की फर्म ‘मेसर्स डायमंड बायबल कंपनी’ को कुल 3,640 चांदी के सिक्कों का ऑर्डर दिया था। इनमें से 3,631 सिक्के भोपाल के सामान्य भंडार में प्राप्त हुए। हर सिक्के की अनुमानित कीमत करीब 2,500 रुपये तय की गई थी। इस हिसाब से रेलवे को लगभग 90 लाख रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है। सबसे गंभीर बात यह है कि सप्लाई के समय न तो धातु की शुद्धता की स्वतंत्र जांच कराई गई और न ही सैंपल टेस्टिंग पर पर्याप्त ध्यान दिया गया। अब सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या इस घोटाले में केवल सप्लायर ही दोषी है या रेलवे के भीतर भी लापरवाही अथवा मिलीभगत हुई है। विजिलेंस जांच का दायरा अब केवल फर्म तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे सप्लाई प्रोसेस और अधिकारियों की भूमिका तक बढ़ाया जा रहा है।
ब्लैकलिस्ट से आगे बढ़ेगी कार्रवाई
मामला सामने आते ही रेलवे प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए इंदौर की दोषी फर्म ‘मेसर्स डायमंड बायबल’ को तत्काल प्रभाव से ब्लैकलिस्ट कर दिया है। इसके साथ ही रेलवे विजिलेंस ने भोपाल के बजरिया थाने में शिकायती आवेदन भी दिया है। थाना प्रभारी पक्ष से मिली जानकारी के अनुसार, रेलवे से जरूरी दस्तावेज और तकनीकी रिपोर्ट मांगी गई हैं, ताकि कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सके। पश्चिम मध्य रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी नवल अग्रवाल ने स्पष्ट किया है कि पूरे मामले की गहराई से जांच की जा रही है और दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। वहीं, पुलिस अधिकारियों का कहना है कि सभी तथ्यों के सामने आने के बाद एफआईआर दर्ज कर आरोपियों की गिरफ्तारी की जाएगी। इस पूरे घटनाक्रम ने न सिर्फ रेलवे की छवि को नुकसान पहुंचाया है, बल्कि भविष्य में ऐसे सम्मान प्रतीकों की पारदर्शिता और गुणवत्ता जांच पर भी बड़े सवाल छोड़ दिए हैं।
