दिल्ली के पुराने इलाके तुर्कमान गेट में स्थित फैज-ए-इलाही मस्जिद के पास बुधवार देर रात अचानक हालात बिगड़ गए, जब नगर निगम (MCD) ने अवैध अतिक्रमण हटाने के लिए बुलडोजर चलाया। यह कार्रवाई दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश के बाद की गई थी, जिसके तहत इलाके में बने कथित अवैध निर्माण को हटाने के निर्देश दिए गए थे। आधी रात हुई इस कार्रवाई के दौरान स्थानीय लोगों में नाराजगी फैल गई और देखते ही देखते माहौल तनावपूर्ण हो गया। हालात उस वक्त और बिगड़े जब भीड़ की ओर से पुलिस पर पथराव किया गया। पथराव में कई पुलिसकर्मी घायल हुए, जिसके बाद पुलिस को स्थिति संभालने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े।
प्रशासन का कहना है कि यह पूरी कार्रवाई कोर्ट के आदेश के तहत कानून के अनुसार की गई, जबकि स्थानीय लोगों का आरोप है कि उन्हें पर्याप्त सूचना नहीं दी गई और जबरन ढहाने की कार्रवाई की गई। मस्जिद के आसपास हुई इस कार्रवाई ने इलाके में दहशत का माहौल बना दिया और मामला तुरंत राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र बन गया।
बुलडोजर एक्शन पर ओवैसी का हमला
फैज-ए-इलाही मस्जिद के पास हुई इस कार्रवाई पर AIMIM चीफ और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। ओवैसी ने इस पूरे बुलडोजर एक्शन को गलत बताते हुए सीधे तौर पर दिल्ली वक्फ बोर्ड की भूमिका पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि जिस जमीन पर कार्रवाई हुई, वह वक्फ की संपत्ति है और इसे ऐसे नहीं हटाया जा सकता। ओवैसी ने 1970 में जारी वक्फ गजट का हवाला देते हुए कहा कि गजट की इंट्री नंबर-40 में इस संपत्ति का स्पष्ट उल्लेख है।
ओवैसी के अनुसार, जब कोई जमीन वक्फ के नाम दर्ज है, तो उस पर किसी भी तरह की कार्रवाई से पहले वक्फ बोर्ड को विश्वास में लेना जरूरी होता है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर यह जमीन वाकई अवैध थी, तो पहले वक्फ बोर्ड से बात क्यों नहीं की गई। ओवैसी ने इसे सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि गंभीर साजिश करार देते हुए कहा कि यह मामला सिर्फ अतिक्रमण हटाने का नहीं, बल्कि वक्फ संपत्तियों के अधिकारों से जुड़ा हुआ है।
RSS से जुड़ी याचिका और सर्वे पर सवाल, वक्फ बोर्ड क्यों रहा बाहर?
इस पूरे मामले में एक और बड़ा सवाल उस याचिका को लेकर खड़ा हुआ है, जिसके आधार पर हाई कोर्ट ने कार्रवाई का आदेश दिया। ओवैसी ने बताया कि यह याचिका ‘सेव इंडिया फाउंडेशन’ नाम की संस्था ने दायर की थी, जिसे उन्होंने RSS से जुड़ा संगठन बताया। ओवैसी के मुताबिक, अदालत ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वे कराने का आदेश दिया, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि इस सर्वे में दिल्ली वक्फ बोर्ड को पक्षकार ही नहीं बनाया गया।
ओवैसी ने कहा कि सर्वे टीम में MCD, रेवेन्यू विभाग और पुलिस के अधिकारी तो शामिल थे, लेकिन जिस संपत्ति को वक्फ की बताया जा रहा है, उस वक्फ बोर्ड का कोई प्रतिनिधि मौजूद नहीं था। उन्होंने सवाल उठाया कि जब जमीन वक्फ की बताई जा रही है, तो बिना वक्फ बोर्ड की मौजूदगी के सर्वे कैसे सही माना जा सकता है। ओवैसी ने इसे न्याय प्रक्रिया में बड़ी चूक बताते हुए कहा कि इससे पूरे मामले की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं।
वक्फ बोर्ड की चुप्पी
असदुद्दीन ओवैसी ने दिल्ली वक्फ बोर्ड की चुप्पी पर भी कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने कहा कि वक्फ बोर्ड को इस मामले में तुरंत अदालत का रुख करना चाहिए था और वक्फ राजपत्र अधिसूचना का हवाला देते हुए अपना पक्ष मजबूती से रखना चाहिए था। ओवैसी के अनुसार, वक्फ बोर्ड को हाई कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करनी चाहिए थी, ताकि किसी भी तरह की एकतरफा कार्रवाई को रोका जा सके।
इस पूरे विवाद के बाद अब कई सवाल खड़े हो गए हैं—क्या वाकई यह जमीन अवैध अतिक्रमण थी या वक्फ की मान्यता प्राप्त संपत्ति? क्या कार्रवाई से पहले सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया? और सबसे बड़ा सवाल, क्या दिल्ली वक्फ बोर्ड की निष्क्रियता ने इस बुलडोजर एक्शन का रास्ता साफ किया? फिलहाल, फैज-ए-इलाही मस्जिद के पास हुई इस कार्रवाई ने दिल्ली की सियासत को गरमा दिया है और आने वाले दिनों में यह मामला अदालत से लेकर संसद तक गूंज सकता है।
