उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से सामने आई यह घटना सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि समाज के उस कड़वे सच को उजागर करती है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। त्रिपुरा के रहने वाले 24 वर्षीय एंजेल चकमा, जो देहरादून की जिज्ञासा यूनिवर्सिटी में MBA छात्र थे, उनकी मौत के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। पिता तरुण प्रसाद चकमा का दर्द शब्दों में बयां नहीं हो पा रहा। उन्होंने कहा, “मेरा बेटा सिर्फ सब्जी लेने गया था। उसका किसी से झगड़ा करने का कोई इरादा नहीं था। वह पढ़ाई में होशियार था और अपने भविष्य के सपने देख रहा था।” पिता के अनुसार, एंजेल का कसूर सिर्फ इतना था कि उसने नस्लीय गालियों का विरोध किया। यही विरोध उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी कीमत बन गया। परिवार का कहना है कि एंजेल न सिर्फ एक अच्छा छात्र था, बल्कि बेहद शांत स्वभाव का इंसान भी था, जिसने कभी किसी से दुश्मनी नहीं रखी।
‘चीनी, मोमो’ कहकर अपमान, विरोध किया तो जानलेवा हमला
एंजेल चकमा के पिता तरुण प्रसाद चकमा ने बातचीत में उस पल को याद करते हुए बताया, जिसने उनके पूरे जीवन को बदल दिया। उन्होंने कहा, “दो बाइक पर कुछ युवक आए और मेरे बेटे को ‘चीनी’, ‘मोमो’ कहकर बुलाने लगे। यह सुनकर उसने बस इतना कहा कि हम भारतीय हैं, हमें इस तरह क्यों कहा जा रहा है।” पिता के मुताबिक, यही बात हमलावरों को नागवार गुजरी और उन्होंने एंजेल पर हमला कर दिया। आरोप है कि हमलावरों ने चाकू से उसके सिर और गर्दन पर कई वार किए। एंजेल को बेरहमी से पीटा गया और सड़क पर छोड़ दिया गया। जब परिवार को सूचना मिली, तो वे तुरंत अस्पताल पहुंचे। “मेरा बेटा ICU में भर्ती था, 17 दिन तक जिंदगी और मौत से लड़ता रहा। हमने हर संभव कोशिश की, लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका,” यह कहते हुए पिता की आवाज भर आई। यह घटना नस्लीय सोच और असहिष्णुता की उस मानसिकता को दिखाती है, जो आज भी समाज के कुछ हिस्सों में जिंदा है।
पुलिस पर उठे सवाल
इस मामले में पिता ने पुलिस की भूमिका पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। तरुण प्रसाद चकमा का कहना है कि घटना के समय पुलिस ने समय पर मदद नहीं की। उन्होंने कहा, “अगर पुलिस तुरंत कार्रवाई करती, तो शायद मेरा बेटा आज जिंदा होता।” पिता का दर्द सिर्फ अपने बेटे तक सीमित नहीं है, बल्कि वह इसे पूरे देश की समस्या मानते हैं। उन्होंने कहा, “मैं नहीं चाहता कि उत्तर-पूर्वी भारत का कोई और बच्चा या छात्र ऐसी स्थिति से गुजरे। यह सिर्फ एंजेल की कहानी नहीं है, यह हर उस छात्र की कहानी है जो पढ़ाई के लिए अपना घर छोड़कर दूसरे राज्य जाता है।” इस बयान के बाद सोशल मीडिया और सामाजिक संगठनों में भी आक्रोश देखने को मिला। लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या उत्तर-पूर्व के छात्रों को आज भी अपने ही देश में अपनी पहचान साबित करनी पड़ेगी। पुलिस का कहना है कि मामले की जांच की जा रही है, लेकिन परिवार और समाज के एक बड़े वर्ग को अब भी न्याय का इंतजार है।
हत्या की धारा, आरोपी फरार और इंसाफ की लंबी राह
यह वारदात 9 दिसंबर की है, जब देहरादून के विकासनगर क्षेत्र के सेलाकुई बाजार में एंजेल चकमा अपने भाई के साथ सब्जी खरीदने गया था। वहां कुछ युवकों ने उसके चेहरे और भाषा को लेकर नस्लीय टिप्पणियां शुरू कीं। विरोध करने पर मारपीट हुई और फिर चाकू से जानलेवा हमला कर दिया गया। गंभीर हालत में एंजेल को ग्राफिक एरा अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां वह करीब 17 दिन तक ICU में रहा, लेकिन अंततः उसने दम तोड़ दिया। सेलाकुई पुलिस के अनुसार, इस मामले में पांच आरोपियों को हिरासत में लिया गया था, जिनमें दो नाबालिग शामिल हैं। पहले मामला मारपीट का दर्ज किया गया था, लेकिन एंजेल की मौत के बाद इसमें हत्या की धारा जोड़ दी गई है। पुलिस ने बताया कि एक आरोपी अभी फरार है, जो नेपाल भाग चुका है। उसकी गिरफ्तारी के लिए टीम गठित की गई है और 25 हजार रुपये का इनाम घोषित किया गया है। यह मामला अब सिर्फ एक आपराधिक केस नहीं, बल्कि देश में नस्लीय भेदभाव, छात्र सुरक्षा और कानून व्यवस्था पर बड़ा सवाल बन चुका है, जिसका जवाब समाज और सिस्टम दोनों को देना होगा
