महाराष्ट्र की राजनीति में अक्सर बड़े गठबंधन विधानसभा या लोकसभा में देखने को मिलते हैं, लेकिन अकोला जिले की अकोट नगर परिषद से आई खबर ने स्थानीय राजनीति को राष्ट्रीय बहस में ला खड़ा किया है। हालिया नगर परिषद चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। कुल 35 सीटों वाली नगर परिषद में 33 सीटों पर चुनाव हुए, जिसमें भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन बहुमत से काफी दूर रही। भाजपा के पास 11 सीटें थीं, जो सरकार बनाने के लिए नाकाफी थीं। ऐसे में सवाल था कि क्या विपक्ष मिलकर भाजपा को सत्ता से दूर रखेगा या फिर कोई अप्रत्या3शित राजनीतिक समीकरण बनेगा। नतीजों के बाद कई दिनों तक अनिश्चितता का माहौल रहा और यही अनिश्चितता बाद में महाराष्ट्र की राजनीति की सबसे चौंकाने वाली कहानी में बदल गई।
‘अकोट विकास मंच’: विचारधारा से ज्यादा सत्ता का गणित
सत्ता की चाबी हासिल करने के लिए भाजपा ने स्थानीय स्तर पर एक ऐसा प्रयोग किया, जिसकी कल्पना शायद किसी ने नहीं की थी। भाजपा नेता माया धुले ने नगराध्यक्ष पद तो जीत लिया, लेकिन परिषद को चलाने के लिए उन्हें बहुमत का सहारा चाहिए था। इसी जरूरत ने ‘अकोट विकास मंच’ को जन्म दिया। यह मंच कोई पारंपरिक गठबंधन नहीं, बल्कि सत्ता के गणित से बना एक साझा मोर्चा है, जिसे अकोला जिला प्रशासन के पास औपचारिक रूप से पंजीकृत कराया गया। इस मंच में भाजपा के साथ AIMIM, प्रहार जनशक्ति पक्ष, शिवसेना के दोनों गुट और एनसीपी के दोनों धड़े शामिल हो गए। कुल मिलाकर यह गठबंधन 25 से अधिक सीटों के समर्थन का दावा करता है, जो बहुमत के आंकड़े से कहीं आगे है। स्थानीय नेताओं का कहना है कि यह मंच विकास के एजेंडे पर बना है, न कि किसी वैचारिक समझौते पर।
BJP और AIMIM साथ क्यों आए?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि BJP और असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM, जो राष्ट्रीय राजनीति में एक-दूसरे के धुर विरोधी माने जाते हैं, आखिर एक ही मंच पर कैसे आ गए। भाजपा जहां हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की राजनीति करती है, वहीं AIMIM खुद को मुस्लिम हितों की आवाज बताती है। मंचों से एक-दूसरे पर तीखे हमले करने वाली ये पार्टियां अकोट में ‘विकास’ के नाम पर साथ दिख रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह गठबंधन किसी वैचारिक बदलाव का संकेत नहीं, बल्कि स्थानीय मजबूरी और सत्ता संतुलन का नतीजा है। AIMIM के लिए यह सत्ता में हिस्सेदारी और स्थानीय प्रभाव बढ़ाने का मौका है, जबकि भाजपा के लिए नगर परिषद की कमान अपने हाथ में रखने का जरिया। दोनों ही दलों ने इस समझौते को अस्थायी और स्थानीय करार दिया है।
राज्य की राजनीति पर क्या पड़ेगा असर
अकोट नगर परिषद का यह प्रयोग भले ही स्थानीय स्तर का हो, लेकिन इसके संकेत दूरगामी माने जा रहे हैं। विपक्षी दल इसे अवसरवाद की राजनीति बता रहे हैं, वहीं समर्थक इसे व्यावहारिक राजनीति का उदाहरण मान रहे हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या आने वाले समय में अन्य नगर निकायों या स्थानीय संस्थाओं में भी ऐसे अनोखे गठबंधन देखने को मिलेंगे। फिलहाल, अकोट में बनी यह सरकार महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ रही है, जहां विचारधाराएं पीछे और सत्ता का गणित आगे नजर आ रहा है। यह गठबंधन टिकाऊ होगा या नहीं, यह तो समय बताएगा, लेकिन इतना तय है कि अकोट से उठी यह सियासी लहर लंबे समय तक चर्चा में बनी रहेगी।
