वेदांता ग्रुप के चेयरमैन और देश के जाने-माने उद्योगपति अनिल अग्रवाल इन दिनों अपनी जिंदगी के सबसे कठिन और भावनात्मक दौर से गुजर रहे हैं। उनके बेटे अग्निवेश अग्रवाल का अचानक निधन न सिर्फ उनके परिवार के लिए, बल्कि कारोबारी जगत के लिए भी एक गहरा झटका है। 49 साल की उम्र में अमेरिका में इलाज के दौरान कार्डियक अरेस्ट से अग्निवेश का निधन हो गया। इस व्यक्तिगत त्रासदी ने अनिल अग्रवाल को भीतर तक झकझोर दिया है। इसी गहरे दुख के बीच उन्होंने एक ऐसा फैसला दोहराया है, जिसने हर किसी का ध्यान खींच लिया है। अनिल अग्रवाल ने कहा है कि वह अपनी कुल कमाई का 75 फीसदी से अधिक हिस्सा समाज के नाम करेंगे। उनका कहना है कि यह कोई नया फैसला नहीं, बल्कि वह वादा है, जो उन्होंने अपने बेटे से किया था। बेटे के जाने के बाद अब यह संकल्प और भी मजबूत हो गया है। उन्होंने साफ कहा कि आगे की पूरी जिंदगी वह सादगी से जिएंगे और अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा सामाजिक कामों में लगाएंगे।
35 हजार करोड़ की दौलत और समाज को लौटाने का इरादा
Forbes के मुताबिक, अनिल अग्रवाल की कुल नेटवर्थ करीब 4.2 अरब डॉलर है, जो भारतीय मुद्रा में लगभग 35,000 करोड़ रुपये के आसपास बैठती है। इतनी बड़ी संपत्ति होने के बावजूद अनिल अग्रवाल का कहना है कि दौलत का असली मकसद सिर्फ खुद तक सीमित रहना नहीं होना चाहिए। उन्होंने अपने भावुक संदेश में लिखा कि जो भी उन्होंने कमाया है, वह समाज की देन है और अब उसे समाज को लौटाना उनकी जिम्मेदारी है। यह पैसा शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, महिलाओं के सशक्तिकरण और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में लगाया जाएगा। अनिल अग्रवाल पहले से ही परोपकार के कामों से जुड़े रहे हैं, लेकिन बेटे के निधन के बाद उन्होंने इसे अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य बना लिया है। उन्होंने यह भी कहा कि वेदांता ग्रुप में काम करने वाला हर कर्मचारी उन्हें अपने परिवार का हिस्सा लगता है और वह उनके भविष्य को सुरक्षित और बेहतर बनाने के लिए भी काम करते रहेंगे। यह फैसला सिर्फ एक उद्योगपति का बयान नहीं, बल्कि एक पिता के दर्द और उसकी सोच का प्रतिबिंब है।
अग्निवेश की यादें और परिवार का दर्द
अग्निवेश अग्रवाल के निधन ने अनिल अग्रवाल और उनकी पत्नी किरण अग्रवाल को पूरी तरह तोड़ दिया है। एक पिता के लिए जवान बेटे को खोने से बड़ा कोई दुख नहीं होता। अनिल अग्रवाल ने अपने संदेश में यह भी लिखा कि इस मुश्किल समय में वह और उनकी पत्नी खुद को संभालने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अग्निवेश न सिर्फ उनका बेटा था, बल्कि एक संवेदनशील और जिम्मेदार इंसान भी था, जो समाज के लिए कुछ करना चाहता था। यही वजह है कि अनिल अग्रवाल अब अपने बेटे की सोच और सपनों को आगे बढ़ाना चाहते हैं। उन्होंने लिखा कि उनका बेटा हमेशा कहता था कि सफलता का मतलब सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना है। बेटे की इन्हीं बातों ने उन्हें यह रास्ता चुनने की ताकत दी है। इस दुखद घटना के बाद भी अनिल अग्रवाल ने जिस तरह समाज के लिए सोचने का फैसला लिया है, वह उन्हें बाकी उद्योगपतियों से अलग बनाता है।
कबाड़ से करोड़ों तक का सफर और वेदांता की कहानी
अनिल अग्रवाल की कहानी संघर्ष, मेहनत और आत्मविश्वास की मिसाल है। उनका जन्म 1954 में बिहार के पटना में हुआ था। बहुत कम उम्र में उन्होंने अपने पिता के साथ कबाड़ के छोटे से कारोबार से काम शुरू किया। 19 साल की उम्र में वह बड़े सपने लेकर मुंबई पहुंचे, जहां न पैसे थे और न ही कोई मजबूत सहारा। शुरुआती दौर में उन्हें कई बिजनेस में नुकसान झेलना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। साल 1976 में उन्होंने वेदांता ग्रुप की नींव रखी, जो आज मेटल, माइनिंग, पावर और ऑयल जैसे बड़े सेक्टर में काम कर रहा है। भारत के साथ-साथ विदेशों में भी वेदांता की मजबूत मौजूदगी है। अनिल अग्रवाल को एक सेल्फ-मेड बिजनेसमैन के तौर पर जाना जाता है। आज जब वह अपनी जिंदगी के सबसे मुश्किल दौर में हैं, तब भी उन्होंने जो फैसला लिया है, वह बताता है कि उनके लिए सफलता का मतलब सिर्फ कारोबार नहीं, बल्कि इंसानियत और समाज के लिए कुछ करना है।
