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पाकिस्तान को ‘दलाल राष्ट्र’ कहने पर खफा हो गए अशोक गहलोत, भड़कते हुए कहा-दलाली क्या होती है…

एस जयशंकर के ‘दलाल राष्ट्र’ बयान पर सियासत तेज, अशोक गहलोत ने कूटनीतिक भाषा पर उठाए सवाल। जानिए पूरे विवाद और अंतरराष्ट्रीय असर की पूरी खबर।

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पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के बीच भारत की सर्वदलीय बैठक में दिए गए एक बयान ने नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। विदेश मंत्री S. Jaishankar द्वारा कथित रूप से “हम दलाल राष्ट्र नहीं हैं” कहे जाने के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत ने इस भाषा पर कड़ी आपत्ति जताई है। गहलोत का कहना है कि इस तरह के शब्द भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश के विदेश मंत्री को शोभा नहीं देते और इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि प्रभावित हो सकती है।

दलाल’ शब्द पर उठे गंभीर सवाल

गहलोत ने बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि किसी भी देश के लिए “दलाल” जैसे शब्द का प्रयोग कूटनीतिक मर्यादा के खिलाफ है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर “दलाली” का अर्थ क्या है और क्या इस तरह की भाषा का इस्तेमाल वैश्विक मंच पर उचित माना जा सकता है। गहलोत ने यह भी कहा कि अगर यह शब्द अनजाने में निकला है तो विदेश मंत्री को स्पष्टीकरण देना चाहिए। उनका मानना है कि ऐसे बयान न सिर्फ राजनीतिक विवाद को जन्म देते हैं बल्कि देश की साख पर भी असर डाल सकते हैं।

पाकिस्तान की भूमिका और पुरानी घटनाओं का जिक्र

पश्चिम एशिया संकट में पाकिस्तान की संभावित मध्यस्थता की चर्चाओं पर भी गहलोत ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि 1965 और Kargil War जैसे संघर्षों में पाकिस्तान की स्थिति क्या रही है। साथ ही उन्होंने Indo-Pakistani War of 1971 का जिक्र करते हुए बताया कि उस समय भारत ने बड़ी रणनीतिक बढ़त हासिल की थी। उनके अनुसार, वर्तमान हालात में पाकिस्तान की तुलना भारत से करना उचित नहीं है और उसकी भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

वैश्विक हालात और मोदी-ट्रंप समीकरण पर टिप्पणी

गहलोत ने अंतरराष्ट्रीय स्थिति को बेहद नाजुक बताते हुए केंद्र सरकार से सतर्क रहने की अपील की। उन्होंने Rahul Gandhi के पुराने बयानों का हवाला देते हुए कहा कि विपक्ष पहले ही ऐसे हालात की चेतावनी दे चुका है। इसके साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री Narendra Modi और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump के रिश्तों पर भी सवाल उठाए। गहलोत के अनुसार, ट्रंप का रवैया कभी दोस्ताना तो कभी आलोचनात्मक रहा है, जो कूटनीतिक दृष्टि से असामान्य और चिंताजनक है। उन्होंने वैश्विक राजनीति में बढ़ती अनिश्चितता को लेकर भी चिंता जताई।

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