देश में ‘लव जिहाद’ और कथित अनैतिक धर्मांतरण को लेकर बने कानून एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। इन कानूनों को चुनौती देने वाली याचिकाएं लंबे समय से सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। इसी बीच अदालत ने राज्यों से एक ऐसा सवाल पूछ लिया है, जिसने पूरे मामले को नई दिशा दे दी है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि तीन हफ्तों के भीतर यह बताया जाए कि आखिर इन कानूनों की जरूरत क्यों पड़ी। अदालत का मानना है कि किसी भी कानून के पीछे ठोस कारण और संवैधानिक आधार होना जरूरी है। यही वजह है कि अब सभी संबंधित राज्यों को तय समयसीमा के भीतर अपना पक्ष रखने के निर्देश दिए गए हैं। अदालत ने यह भी संकेत दिया है कि जनवरी के तीसरे हफ्ते में इस मामले की अंतिम सुनवाई की दिशा में कदम बढ़ाया जा सकता है, जिससे लंबे समय से चल रही बहस किसी नतीजे तक पहुंचे।
कई राज्यों में लागू कानून, लेकिन विवाद बरकरार
उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे कई राज्यों में पहले ही लव जिहाद और जबरन या धोखाधड़ी से कराए जाने वाले धर्मांतरण को रोकने के लिए कानून बनाए जा चुके हैं। इन कानूनों का मकसद बताया गया कि विवाह या अन्य माध्यमों से किसी व्यक्ति को दबाव, लालच या गलत पहचान के जरिए धर्म बदलने के लिए मजबूर न किया जाए। हालांकि, इन कानूनों को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इन प्रावधानों से व्यक्तिगत स्वतंत्रता, पसंद की आजादी और निजता के अधिकार पर असर पड़ता है। कई मामलों में इन कानूनों के दुरुपयोग के आरोप भी सामने आए हैं। दूसरी ओर, राज्य सरकारों का तर्क है कि ये कानून समाज में पारदर्शिता और सुरक्षा बनाए रखने के लिए जरूरी हैं। अब सुप्रीम कोर्ट ने जब सीधे तौर पर इन कानूनों की जरूरत पर जवाब मांगा है, तो यह साफ हो गया है कि अदालत हर पहलू को गंभीरता से परखना चाहती है।
समर्थन में भी याचिका, जावेद मलिक की दलील
इसी मामले में एक नया मोड़ तब आया, जब अखिल भारतीय पसमांदा मुस्लिम मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष जावेद मलिक ने इन कानूनों के समर्थन में याचिका दाखिल की। उनकी याचिका में कहा गया है कि लव जिहाद और अनैतिक धर्मांतरण जैसे मुद्दों पर कानून होना जरूरी है, ताकि कमजोर वर्गों का शोषण रोका जा सके। जावेद मलिक की दलील है कि कई बार धर्मांतरण के मामलों में सामाजिक और आर्थिक दबाव काम करता है, जिससे खास समुदायों को नुकसान पहुंचता है। उनकी याचिका पर फिलहाल अलग से सुनवाई नहीं हुई है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह आश्वासन जरूर दिया है कि इसे बाकी सभी याचिकाओं के साथ ही सुना जाएगा। इससे साफ है कि अदालत सिर्फ विरोधी पक्ष ही नहीं, बल्कि समर्थन में रखे गए तर्कों को भी समान रूप से सुनना चाहती है।
तीन हफ्ते की समयसीमा, 28 जनवरी पर टिकी निगाहें
सुप्रीम कोर्ट ने सभी संबंधित राज्यों को निर्देश दिया है कि वे तीन हफ्तों के भीतर अपना जवाब दाखिल करें और यह स्पष्ट करें कि इन कानूनों को लागू करने के पीछे क्या ठोस वजहें रहीं। अदालत ने संकेत दिए हैं कि जनवरी के तीसरे हफ्ते में इस मामले को अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जा सकता है, जबकि अगली तारीख 28 जनवरी तय की गई है। माना जा रहा है कि इस सुनवाई के दौरान अदालत संविधान, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राज्य के अधिकारों के बीच संतुलन पर गहराई से विचार करेगी। यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक रूप से भी बेहद संवेदनशील है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला न केवल मौजूदा कानूनों की दिशा तय करेगा, बल्कि भविष्य में ऐसे किसी भी कानून के लिए एक बड़ा आधार भी बनेगा। अब सबकी निगाहें राज्यों के जवाब और अदालत की अगली सुनवाई पर टिकी हैं।
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