उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ और मऊ जिले के दो युवकों की कहानी अब एक दर्दनाक हकीकत बनकर सामने आई है। अजहरुद्दीन और रामचंद्र वर्ष 2024 में बेहतर रोजगार की तलाश में रूस गए थे। परिजनों के अनुसार, उन्हें एजेंटों ने गार्ड और हेल्पर की नौकरी का झांसा दिया था। लेकिन रूस पहुंचने के बाद हालात पूरी तरह बदल गए और दोनों युवकों को कथित तौर पर युद्ध क्षेत्र में भेज दिया गया। इस दौरान वे रूस-यूक्रेन युद्ध की परिस्थितियों में फंस गए, जहां कई लोग घायल हुए और कई लापता हो गए।
युद्ध क्षेत्र में फंसने की दर्दनाक सच्चाई
परिजनों का आरोप है कि दोनों युवकों को बिना इच्छा के सेना जैसी परिस्थितियों में ट्रेनिंग देकर युद्ध में झोंक दिया गया। इसी दौरान वे लापता हो गए। परिवार लगातार उनकी तलाश करता रहा, लेकिन कोई ठोस जानकारी नहीं मिल सकी। यह मामला धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामने आया, जिसके बाद जांच और दस्तावेजी प्रक्रिया शुरू हुई। बताया जाता है कि कई अन्य भारतीय युवक भी इसी तरह के हालात में वहां फंसे थे, जिनमें से कुछ लौट आए जबकि कई का कोई पता नहीं चल सका।
दो साल बाद डीएनए से हुई पहचान
करीब दो साल बाद, गुरुवार को अजहरुद्दीन और रामचंद्र के अवशेष भारत लाए गए। उनकी पहचान डीएनए परीक्षण के जरिए सुनिश्चित की गई। वाराणसी एयरपोर्ट पर प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में सभी औपचारिक प्रक्रियाएं पूरी की गईं और फिर अवशेष परिजनों को सौंप दिए गए। परिवार के सदस्यों के अनुसार, रूस में युद्ध के दौरान कई शवों की पहचान करना बेहद कठिन था, जिसके कारण डीएनए जांच ही एकमात्र विकल्प बचा था। इसी प्रक्रिया के बाद दोनों की पहचान स्पष्ट हो सकी।
परिवार का दर्द और एजेंटों पर गंभीर आरोप
अजहरुद्दीन के भाई अजीमुद्दीन ने बताया कि वह अपने भाई की तलाश में सऊदी अरब तक की नौकरी छोड़कर भारत और रूस के दूतावासों के चक्कर लगाता रहा। परिवार का आरोप है कि यह एक संगठित धोखाधड़ी का मामला है, जिसमें युवाओं को नौकरी का लालच देकर युद्ध क्षेत्र में भेजा गया। परिजनों ने जिम्मेदार एजेंटों के खिलाफ सख्त कार्रवाई, निष्पक्ष जांच और आर्थिक मुआवजे की मांग की है। यह घटना न केवल परिवारों के लिए दर्दनाक है, बल्कि विदेशों में रोजगार के नाम पर हो रहे धोखे की गंभीर तस्वीर भी पेश करती है।
