देश की राजधानी दिल्ली में मॉनसून सत्र के बीच अचानक सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अचानक अपनी भारी-भरकम वीआईपी सुरक्षा, गाड़ियों का काफिला और तामझाम छोड़कर दिल्ली की सड़कों पर एक आम नागरिक की तरह ऑटो रिक्शा में सफर करते नजर आए। हर कोई हैरान था कि आखिर कश्मीर के मुख्यमंत्री को दिल्ली में ऑटो की सवारी क्यों करनी पड़ी? दरअसल, उमर अब्दुल्ला अपने पिता फारूक अब्दुल्ला और दर्जनों समर्थकों के साथ जम्मू-कश्मीर को फिर से पूर्ण राज्य (Statehood) का दर्जा दिलाने की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने पहुंचे थे। लेकिन जैसे ही वे वहां पहुंचे, वहां पहले से ही चल रहे अन्य प्रदर्शनों के कारण स्थिति तनावपूर्ण थी। प्रशासन ने कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए उमर अब्दुल्ला को प्रदर्शन करने की इजाजत देने से साफ इनकार कर दिया, जिसके बाद दिल्ली की सड़कों पर एक नया सियासी हाई-ड्रामा शुरू हो गया।
सड़क पर बैठे मुख्यमंत्री: ‘मुल्क की राजधानी में जम्हूरियत का गला घोंटा जा रहा है’
जब दिल्ली पुलिस ने उमर अब्दुल्ला और उनके काफिले को जंतर-मंतर की तरफ बढ़ने से रोक दिया, तो वे पीछे हटने के बजाय बैरिकेडिंग के पास ही सड़क पर धरने पर बैठ गए। धूल और धूप के बीच ज़मीन पर बैठे उमर अब्दुल्ला के तेवर बेहद तल्ख नजर आए। उन्होंने बेहद भावुक और आक्रामक अंदाज़ में मीडिया से कहा कि हम अपने देश की राजधानी में कोई हिंसा करने नहीं, बल्कि सिर्फ अपना लोकतांत्रिक हक मांगने आए हैं। दूर-दराज के राज्य होने के कारण बाकी देश की नजरें उन पर कम पड़ती हैं, इसलिए वे दिल्ली आकर अपनी आवाज बुलंद करना चाहते थे। उमर ने आरोप लगाया कि बेहद शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने की कोशिश करने के बावजूद उन्हें रोका गया, जो सीधे तौर पर लोकतंत्र (जम्हूरियत) का गला घोंटने जैसा है। उन्होंने साफ कहा कि वे केंद्र सरकार से कोई भीख नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर की जनता का वो हक मांग रहे हैं जिसका वादा खुद सरकार ने किया था।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बड़ा सवाल: ‘आखिर क्या है वो सही समय?’
सड़क पर बैठे जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री ने सीधे तौर पर देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) और संसद के भीतर केंद्र सरकार द्वारा किए गए वादों को याद दिलाया। उमर अब्दुल्ला ने कहा कि केंद्र सरकार ने संसद के पटल पर और सुप्रीम कोर्ट के सामने यह हलफनामा दिया था कि जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव संपन्न होते ही ‘जितनी जल्दी हो सके’ (As soon as possible) राज्य का दर्जा वापस लौटा दिया जाएगा। उमर ने सवाल उठाया कि राज्य में साल 2024 में बेहद शांतिपूर्ण और सफल चुनाव हो चुके हैं, जनता ने अपनी सरकार चुन ली है, तो फिर अब देरी क्यों हो रही है? उन्होंने तंज कसते हुए पूछा कि केंद्र सरकार हमेशा कहती है कि “सही समय आने पर” (At the appropriate time) दर्जा दिया जाएगा, लेकिन कोई हमें यह क्यों नहीं समझाता कि वो सही समय आखिर कब आएगा? उमर ने चुनौती दी कि अगर केंद्र सरकार का इरादा राज्य का दर्जा वापस देने का नहीं है, तो वह खुलेआम इस बात को स्वीकार करे, ताकि हम भी अपना आगे का रास्ता तय कर सकें।
कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में आंसू गैस के गोले और युवाओं का दर्द
जंतर-मंतर पर रास्ता रोके जाने के बाद उमर अब्दुल्ला और उनके समर्थक अपनी बात रखने के लिए ‘कॉन्स्टिट्यूशन क्लब’ की तरफ बढ़े, लेकिन वहां भी हालात और बिगड़ गए। प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस द्वारा आंसू गैस (Tier Gas) के गोलों का इस्तेमाल किया गया, जिसकी चपेट में खुद मुख्यमंत्री और उनके साथी भी आए। इस कार्रवाई पर गहरा दुख जताते हुए उमर अब्दुल्ला ने कहा कि देश के कोने-कोने से न्याय की उम्मीद लेकर आए युवा लड़के-लड़कियों पर इस तरह बल प्रयोग करना बेहद अफसोसजनक है। आपको बता दें कि साल 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद से जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया था, जिसके बाद से नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी जैसी पार्टियां लगातार पूर्ण राज्य की बहाली की मांग कर रही हैं ताकि जम्मू-कश्मीर की अपनी चुनी हुई सरकार के पास फैसले लेने के पूरे अधिकार हों। दिल्ली में हुआ यह बवाल यह साफ संकेत दे रहा है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद से लेकर सड़क तक थमने वाला नहीं है।
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