राजस्थान के सिरोही जिले में इन दिनों अरावली पर्वतमाला को लेकर माहौल पूरी तरह बदला हुआ है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों और पर्यावरण संरक्षण को लेकर बढ़ती जागरूकता के बीच जिले भर में “सेव अरावली” अभियान ने जोर पकड़ लिया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से लेकर गांव-ढाणियों और कस्बों की सड़कों तक, हर जगह एक ही आवाज सुनाई दे रही है—“विकास के नाम पर अरावली का विनाश स्वीकार नहीं।” आम लोगों से लेकर सामाजिक संगठनों, युवाओं, किसानों और बुद्धिजीवियों तक, सभी इस मुद्दे पर एकजुट होते नजर आ रहे हैं। लोगों का कहना है कि अरावली केवल पहाड़ों की श्रृंखला नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के जीवन का आधार है। जल स्रोतों की सुरक्षा, पर्यावरण संतुलन और स्थानीय जलवायु को बनाए रखने में अरावली की भूमिका को लेकर अब लोग पहले से कहीं अधिक सजग दिखाई दे रहे हैं। यही वजह है कि सिरोही जिले में विरोध की यह लहर लगातार तेज होती जा रही है।
गुरु शिखर से जुड़ी अरावली की अहम भूमिका पर सवाल
अरावली पर्वतमाला की सबसे ऊंची चोटी गुरु शिखर भी इसी जिले में स्थित है, जो माउंट आबू क्षेत्र की पहचान मानी जाती है। लगभग 1722 मीटर ऊंचा गुरु शिखर न केवल एक प्राकृतिक धरोहर है, बल्कि पूरे दक्षिण-पश्चिम राजस्थान के लिए जल और पर्यावरण का प्रमुख आधार भी है। स्थानीय लोगों का मानना है कि अरावली पर्वतमाला बारिश के पानी को रोकने, भूजल रिचार्ज करने और तापमान संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खनन गतिविधियां शुरू होती हैं, तो इसका सीधा असर जंगलों, वन्यजीवों और मानव जीवन पर पड़ेगा। अरावली पहले ही देश की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में गिनी जाती है, जो लगातार मानवीय हस्तक्षेप के कारण कमजोर होती जा रही है। ऐसे में सिरोही के लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या थोड़े से आर्थिक लाभ के लिए आने वाली पीढ़ियों का भविष्य दांव पर लगाया जा सकता है।
800 हेक्टेयर खनन परियोजना ने क्यों बढ़ाई लोगों की चिंता
सिरोही जिले में अरावली पर्वतमाला से सटे क्षेत्रों में प्रस्तावित एक बड़ी खनन परियोजना ने इस आंदोलन को और हवा दे दी है। इस परियोजना के तहत करीब 800.9935 हेक्टेयर, यानी लगभग 3200 बीघा भूमि पर खनन की योजना बनाई गई है। यह क्षेत्र पिण्डवाड़ा तहसील के वाटेरा, भीमाना, भारजा और रोहिड़ा ग्राम पंचायतों के अंतर्गत आता है, जो अरावली रेंज के बेहद करीब स्थित हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि यदि इस पैमाने पर खनन शुरू हुआ, तो पहाड़ों की संरचना को अपूरणीय नुकसान पहुंचेगा। धूल, प्रदूषण और जल स्रोतों के सूखने का खतरा बढ़ जाएगा, जिससे खेती और पशुपालन पर भी सीधा असर पड़ेगा। ग्रामीणों का आरोप है कि विकास के नाम पर इस तरह की परियोजनाएं असल में स्थानीय लोगों के जीवन और आजीविका को खतरे में डाल देती हैं। यही कारण है कि खनन प्रस्ताव के खिलाफ गुस्सा अब केवल विरोध तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक संगठित जन आंदोलन का रूप ले चुका है।
तीन महीने का विरोध और 28 जनवरी 2026 से बड़े आंदोलन का ऐलान
पिछले तीन महीनों से सिरोही जिले में इस खनन परियोजना के खिलाफ लगातार विरोध देखने को मिल रहा है। जगह-जगह रैलियां निकाली गईं, धरना-प्रदर्शन हुए और सर्व समाज की महापंचायतों का आयोजन किया गया। हाल ही में हुई एक बड़ी महापंचायत में हजारों की संख्या में लोग शामिल हुए, जहां सरकार को स्पष्ट संदेश दिया गया कि अरावली से किसी भी तरह का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। महापंचायत में सर्व समाज ने एक स्वर में कमलेश मेटाकास्ट से जुड़ी प्रस्तावित खनन परियोजना को तुरंत निरस्त करने की मांग रखी। साथ ही यह चेतावनी भी दी गई कि यदि सरकार ने समय रहते फैसला वापस नहीं लिया, तो 28 जनवरी 2026 से जिले में एक बड़ा जन आंदोलन शुरू किया जाएगा। आंदोलनकारियों का कहना है कि यह लड़ाई किसी एक गांव या तहसील की नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के भविष्य की है। उनका दावा है कि यदि जरूरत पड़ी तो यह आंदोलन राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक ले जाया जाएगा, ताकि अरावली को बचाने की आवाज हर मंच पर सुनी जा सके।
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